Friday, November 7, 2008

अँधा बांटे रेवडी : ब्लॉग चर्चा

"चर्चा में शामिल चिट्ठाकारों एवं ब्लागवाणी का आभार जिनके कारण चर्चा पूर्ण हुई "

Wednesday, November 5, 2008

"जय ब्लॉगर जय हिन्दी ब्लागिंग " लिंक पोस्ट

'' टिप्पणी चर्चा '', करूँ भी तो क्यों न ? चर्चाएँ ही तो देश में हो रहीं हैं और देश चल ये रहा है........................

Monday, November 3, 2008

"सुनो....सुनो.....सुनो.....साहित्य लेखन के विषय चुक गए हैं...! "

"कसैला मुंह "- लेकर कहाँ जाएँ भाई पंचम जी ? निपट विष पचाऊ लग रहे हैं । असल में डर ये है कि " सफ़ेद झक्क घर " के सामने से निकलने वाला कोई विनम्र पुरूष उनके " सफ़ेद झक्क घर "-घर की दीवार पे माडर्न आर्ट न बना दे । मेरी राय में अपनी भी जेईच्च प्राबलम्ब है हम तो इस के शिकार हुए हैं चलो अच्छा हुआ अब इकला चलो का नारा सही लगता है हमको ।"अबोध का बोध पाठ " जैसी सार्थक पोस्ट लिखी जा रहीं हो और ......और लम्हे हँस रहें हैं ')">तो हम भी पीछे क्यों रहें भई ! अनुजा जी आदतन धमाका करतीं आज की पोस्ट के लिए मेरी ओर से लाल-पीला-हरा-भगवा-नीला हर रंग का सलाम !! अनुजा जी इनके बारे में पहले ही बता चुका हूँ कि भाई लोग कहते फ़िर रहे हैं इस कथा में देखिए:-

चिंता और ऊहापोह वश ,गुरुदेव ने ऐलान कर दिया-"सुनो....सुनो.....सुनो.....साहित्य लेखन के विषय चुक गए हैं...! "क्या................विषय चुक गए हैं ? हाँ, विषय चुक गए हैं ! तो अब हम क्या करें....? विषय का आयात करो कहाँ से .... ? चीन से मास्को से .....? अरे वही तो चुक गए हैं....! फ़िर हम क्या करें..........? लोकल मेन्यूफेक्चरिंग शुरू करो औरत का जिस्म हो इस पे लिखो भगवान,आस्था विश्वास....भाषा रंग ..! अरे मूर्ख ! इन विषयों पे लिख के क्या दंगे कराएगा . तो इन विषयों पर कौन लिखेगा ? लिखेगा वो जिसका प्रकाशन वितरण नेट वर्क तगड़ा हो वही लिखेगा तू तो ऐसा कर गांधी को याद कर , ज़माना बदल गया बदले जमाने में गांधी को सब तेरे मुंह से जानेंगे तो ब्रह्म ज्ञानी कहाएगा ! गुरुदेव ,औरत की देह पर ? लिख सकता है खूब लिख इतना कि आज तक किसी ने न लिखा हो ******************************************************************************************

लोग बाग़ चर्चा करेंगे, करने दो हम यही तो चाहतें हैं कि इधर सिर्फ़ चर्चा हो काम करना हमारा काम नहीं है. " तो गुरुदेव, काम कौन करेगा ? जिसको काम करके रोटी कमाना हो वो करे हम क्यों हम तो ''राजयोग'' लेकर जन्में है.हथौड़ा,भी सहज और हल्का सा हो गया है . वेद रत्न शुक्ल,, की टिप्पणी अपने आप में एक पूरी पोस्ट बन गई इस ब्लॉग पर ***********************************************************************************
चलो चलते-चलते एक गीत हो जाए अदेह के सदेह प्रश्न कौन गढ़ रहा कहो ? कौन गढ़ कहो ? बाग़ में बहार में सावनी फुहार में पिरो गया किमाच कौन? मोगरे हार में ? और दोष मेरे सर कौन मढ़ गया कहो..? एक गीत आस का एक नव प्रयास सा गीत था अगीत था या कोई कयास था..! ताले मन ओ'भाव पे कौन जड़ गया कहो ..? जो भी सोचा बक दिया अपना अपना रख लिया असहमति पे आपने सदा ही है सबक दिया पग तले मुझे दबा कौन बढ़ गया कहो ..? (आभारी हूँ जिनका :अंशुमाली रस्तोगी,मत विमत,पंचम जी और उनका जो सहृदयता से चर्चा का आनंद लेंगे ) और ब्लॉगवाणी के प्रति कृतज्ञ हूँ

इंक ब्लागिंग

इंक ब्लागिंग की सचाई ये है कि तीसरा शेर सुधारने के लिए कटा पिटी करनी होती किंतु ऑन लाइन में ऐसा नहीं फ़िर कित्ते इंतजाम लगते हैं अनूप जी,है समीर भाई लिखो फोटो खींचो नीले दाँतों से ट्रांसफर करो यानी घंटे भर की मशक्कत कोई आएगा इसकी कोई गारंटी नहीं !
ग़ज़ल ख़ुद सुलगते रहे सुलगाते रहे ख़ुद को ख़ुद की अगन से जलाते रहेप्यार में डूब कर हुए एक के प्यार उनका हो पावन मनाते रहेसच से जब भी हुआ आमना-सामना बगलें झांका किए मुंह चुराते रहे । जिस जहाँ ने दिया नाम शोहरत हमें बदुआऐँ उसे ही सुनाते रहे । हम हमीं में जिए तो जिए क्या जिए रेवडी ख़ुद ही ख़ुद को खिलाते रहे ॥
{ये ग़ज़ल है या नहीं मुझे नही मालूम अत:इसे पद्य का दर्जा ही दे दीजिए यही ग़ज़ल का अनुशासन न हो इसमें तो }

Sunday, November 2, 2008

लता जी का सुमधुर गीत

Lata Mangeshkar widget by 6L & AM

उमर-खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद कर्ता कवि स्वर्गीय केशव पाठक

मुक्तिबोध की ब्रह्मराक्षस का शिष्य, कथा को आज के सन्दर्भों में समझाने की कोशिश करना ज़रूरी सा होगया है । मुक्तिबोध ने अपनी कहानी में साफ़ तौर पर लिखा था की यदि कोई ज्ञान को पाने के बाद उस ज्ञान का संचयन,विस्तारण,और सद-शिष्य को नहीं सौंपता उसे मुक्ति का अधिकार नहीं मिलता । मुक्ति का अधिकारक्या है ज्ञान से इसका क्या सम्बन्ध है,मुक्ति का भय क्या ज्ञान के विकास और प्रवाह के लिए ज़रूरीहै । जी , सत्य है यदि ज्ञान को प्रवाहित न किया जाए , तो कालचिंतन के लिए और कोई आधार ही न होगा कोई काल विमर्श भी क्यों करेगा। रहा सवाल मुक्ति का तो इसे "जन्म-मृत्यु" के बीच के समय की अवधि से हट के देखें तो प्रेत वो होता है जिसने अपने जीवन के पीछे कई सवाल छोड़ दिये और वे सवाल उस व्यक्ति के नाम का पीछा कर रहेंहो । मुक्तिबोध ने यहाँ संकेत दिया कि भूत-प्रेत को मानें न मानें इस बात को ज़रूर मानें कि "आपके बाद भी आपके पीछे " ऐसे सवाल न दौडें जो आपको निर्मुक्त न होने दें !जबलपुर की माटी में केशव पाठक,और भवानी प्रसाद मिश्र में मिश्र जी को अंतर्जाल पर डालने वालों की कमीं नहीं है किंतु केशवपाठक को उल्लेखित किया गया हो मुझे सर्च में वे नहीं मिले । अंतरजाल पे ब्लॉगर्स चाहें तो थोडा वक्त निकाल कर अपने क्षेत्र के इन नामों को उनके कार्य के साथ डाल सकतें है । मैं ने तो कमोबेश ये कराने की कोशिश की है । छायावादी कविता के ध्वजवाहकों में अप्रेल २००६ को जबलपुर के ज्योतिषाचार्य लक्ष्मीप्रसाद पाठक के घर जन्में केशव पाठक ने एम ए [हिन्दी] तक की शिक्षा ग्रहण की किंतु अद्यावासायी वृत्ति ने उर्दू,फारसी,अंग्रेजी,के ज्ञाता हुए केशव पाठक सुभद्रा जी के मानस-भाई थे । केशव पाठक का उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद..">उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद..[०१] करना उनकी एक मात्र उपलब्धि नहीं थी कि उनको सिर्फ़ इस कारण याद किया जाए । उनको याद करने का एक कारण ये भी है-"केशव विश्व साहित्य और खासकर कविता के विशेष पाठक थे " विश्व के समकालीन कवियों की रचनाओं को पड़ना याद रखना,और फ़िर अपनी रचनाओं को उस सन्दर्भ में गोष्टीयों में पड़ना वो भी उस संदर्भों के साथ जो उनकी कविता की भाव भूमि के इर्द गिर्द की होतीं थीं ।समूचा जबलपुर साहित्य जगत केशव पाठक जी को याद तो करता है किंतु केशव की रचना धर्मिता पर कोई चर्चा गोष्ठी ..........नहीं होती गोया "ब्रह्मराक्षस के शिष्य " कथा का सामूहिक पठन करना ज़रूरी है। यूँ तो संस्कारधानी में साहित्यिक घटनाओं का घटना ख़त्म सा हो गया है । यदि होता भी है तो उसे मैं क्या नाम दूँ सोच नहीं पा रहा हूँ । इस बात को विराम देना ज़रूरी है क्योंकि आप चाह रहे होंगे [शायद..?] केशव जी की कविताई से परिचित होना सो कल रविवार के हिसाबं से इस पोस्ट को उनकी कविता और रुबाइयों के अनुवाद से सजा देता हूँ
सहज स्वर-संगम,ह्रदय के बोल मानो घुल रहे हैं शब्द, जिनके अर्थ पहली बार जैसे खुल रहे हैं . दूर रहकर पास का यह जोड़ता है कौन नाता कौन गाता ? कौन गाता ? दूर,हाँ,उस पार तम के गा रहा है गीत कोई , चेतना,सोई जगाना चाहता है मीत कोई , उतर कर अवरोह में विद्रोह सा उर में मचाता ! कौन गाता ? कौन गाता ? है वही चिर सत्य जिसकी छांह सपनों में समाए गीत की परिणिति वही,आरोह पर अवरोह आए राम स्वयं घट घट इसी से ,मैं तुझे युग-युग चलाता , कौन गाता ? कौन गाता ? जानता हूँ तू बढा था ,ज्वार का उदगार छूने रह गया जीवन कहीं रीता,निमिष कुछ रहे सूने. भर क्यों पद-चाप की पद्ध्वनि उन्हें मुखरित बनाता कौन गाता ? कौन गाता ? हे चिरंतन,ठहर कुछ क्षण,शिथिल कर ये मर्म-बंधन , देख लूँ भर-भर नयन,जन,वन,सुमन,उडु मन किरन,घन, जानता अभिसार का चिर मिलन-पथ,मुझको बुलाता . कौन गाता ? कौन गाता ?
सन्दर्भ ०१:काकेश की कतरनें

Friday, October 31, 2008

"चिंता ही नहीं चिंतन भी :

वेबदुनिया पर मेरा ब्लॉग "सव्यसाची" पर पोस्ट उपलब्ध है आपके एक क्लिक की ज़रूरत है उत्साह वर्धन के लिए सादर गिरीश बिल्लोरे मुकुल जबलपुर

Wednesday, October 29, 2008

मित्र चर्चा 02 : राजीव गुप्त: जन्म दिन मुबारक़ हो

राजीव गुप्ता , है स्वर्गीय पत्रकार श्री "हीरालाल गुप्त मधुकर ",के पुत्र साथ ही एक कुशल संगठक मौनचिन्तक आज इअनके जन्म-दिवस पर हमारी और से हार्दिक शुभ कामनाएं

{छवि:साभार डाक्टर विजय तिवारी 'किसलय' के ब्लॉग "यहाँ से ", }

मित्र चर्चा 01 : गणेश मिश्रा जी एक सफल चरित्र

जीवन में कष्ट फ़िर भी
शांत तरल सरिता प्रवाह, की बानगी........!! जी हाँ आत्म संघर्ष और सदा सादगी....!! न वो गुमसुम न मौन किंतु सहज सा मैं सोचूँ -"ये योगी कौन...!!" है साथ सबके मन में गागर गागर में होता है शांत-निर्मल-सागर !! चलो आज हम भी खोजेंगे व्यग्रता का मुख मोड़ेंगे । शांत-सहजता से नाता जोड़ेगें !! [मित्र गणेश मिश्रा के लिए एक कविता उनके व्यक्तित्व को छूने की कोशिश शायद सफल भी है.....?]

Tuesday, October 14, 2008

सुनो समय

इस बीहड़ से गुज़रते मुझे बड़े ही डरावने से लगे थे समय तुम जो प्रिया के इंतज़ार के वक्त कितने अपने से .......? समय तुम ही थे जो मुझे अपमानित कर गए थे हाँ तब जब माँ का शव लाया गया और उभर आयीं थी निस्तब्धाताएं एक साथ मेरे साथ तुम भी रुदन कर रहे थे हाँ और तब भी जब बहनों को विदा किया था ! तुम मेरे साथ ही तो थे समय तुम मेरे साथ हर कदम हो हमकदम प्रिय-मित्र बस एक बार हाँ एक बार मुझे छोड़ दो अकेला जी हाँ और रुक जाओ कहीं आराम ही कर लो शायद मैं अकेले की क्षमताएं जान सकूं एक बार अपने आप को पहचान सकूं{चित्र ज्ञानदत्त जी से बिन पूछे आभार सहित }

Wednesday, October 8, 2008

फ़िल्म आज फ़िर जीने की तमन्ना है में आभास जोशी का अहम किरदार होगा

जबलपुर में अपने चाहने वालों के साथ आभास फिल्म में बतौर गायक ही नहीं ">कम उम्र , ही ,आभास फिल्म में बतौर गायक ही नहीं ">आभास , - ने जो कर दिखाया ,बावरे-फकीरा ", यानी सद्गुरुसाईं नाथ की कृपा ही कहूँगा। संकोची तो नहीं पर सभी का सम्मान करता है आभास मुझे गोल गुड्डे से आभास की बचपन की यादे और आज उसका मुकान देख कर लगता है गोया दुनियाँ में कुछ भी असंभव कभी नहीं शत्रुघ्न सिंहां की पत्नी की फ़िल्म में अहम् भुमिका में आभास रेखा और शत्रु जी के बेटे के रूप में नज़र आएगा ।एक दैनिक समाचार पत्र के प्रायोजन में गरबा-महोत्सव के समापन कराने आए आभास ने बताया की मुझे लगातार व्यस्त कर दिया फ़िल्म और संगीत इंडस्ट्री ने । जबलपुर और मध्य प्रदेश के लिए इस गौरव पुत्र पर गर्व की बात ये भी है की वो आज भी कस्बाई शहर को नहीं भूल पाया ।

Monday, October 6, 2008

खुला ख़त: अज्ञातानंद जी के नाम

<="चित्र:मिसिजीवी जी से साभार "

प्रिय अज्ञातानंद जी “सादर-अभिवादन” आपका ख़त मिला पड़कर दुःख हुआ कि आप का ज़िक्र नही कर पाया अपनी एक पोस्ट पर भाई साहब ये सही है कि आपका भेजा हुआ वेतन जो ब्लॉगर की हैसियत से लिखने के लिए प्राप्त हो चुका है जिससे मैं अपने बाल-बच्चों का पालन पोषण कर रहा हूँ !.किंतु फ़िर भी आपका नाम न आने से मुझे ख़ुद खेद है यदि आप को कष्ट हुआ तो आप सेवा आचरण अधिनियम के तहत मेरे विरुद्ध कार्रवाई कर दीजिए .पीछे से छिप कर गरियाएं न इससे ब्लागिंग की परम्परा को ठेस पहुंचेगी अब इन एग्रीग्रेटर्स को मैं कैसे समझाऊं कि वे पहला पेज आप जैसे अज्ञातानंद ब्लॉगर बनाम टिप्पणीकारों के लिए यह पंक्ति लिख दें-"यह एग्रीगेशन उन अनाम अज्ञातानन्दों ब्लॉगर बनाम टिप्पणीकारों की '..............' श्रद्धासुमन अर्पित करता है " अगर इस से आपको शान्ति मिले तो ठीक है वरना कोई बात नहीं अगले पितर-पक्ष में कुछ करूंगा ? एक बात साफ़ तौर पर सुनो अज्ञातानंद जी आप न तो "शी" समझ में आए न ही "ही" किंतु किसी न किसी जेंडर से ताल्लुक ज़रूर रखतें हैं सो हाल फिलहाल हम आपको कॉमन-जेंडर में दाल के आपसे विनम्र निवेदन कर देते हैं कि ब्लॉग मेरा अपना विचार मंच है इसके लिए मुझे कोई वेतन-भत्ते नहीं आ रहे हैं सो फटे में टांग मत अढ़ाओं क्योंकि टांग फंसी यात्रा रुकी " अगर हम हिन्दी को अंतर्जाल पे फैला रए हैं तो आपको पेट में दर्द होने तक तो ठीक है किंतु पीड़ा का स्तर "प्रसव पीडा" पहुँच जाए तो इसमें अपन का कोई अवदान नहीं है . एक दिन मेरे एक ब्लॉगर मित्र ने बता यार दिमाग ख़राब है...! क्यों क्या हुआ हमने पूछा ? भैया बोले:-"यार घर में हूँ....अभी आया बीवी पड़ोस वाली भाभी के साथ किटी-पार्टी में गयीं है सोचा ब्लॉग लिख लूँ ब्लॉग खोला तो तीन महीने पुरानी पोस्ट पे एक भी टिप्पणी नई है ?" भैया एकाध तो अपुन भेज देते हैं शेष आप अज्ञातानंद बन के " मुझे लगता है कहीं तुम वही तो नही कोई गल नहीं तुम जो भी हो भैया मेरे मालिक आका कुछ भी नहीं हो किंतु पीछे लगने वाले "........." ज़रूर हो तुम्हारी वफादारी को सलाम भेजना है "अपन लिंक मुझे दे दे ठाकुर/ठकुराईन........." नवरात्रि की शुभ कामनाओं के साथ

Tuesday, September 30, 2008

बाबा हरभजन सिंह मन्दिर फोटो ब्लॉग

बाबा के मन्दिर में बाबा को माथा टेकने जाते दर्शनार्थी
बाबा राम भक्त हनुमान के समान ही प्रतीत होते हैं , जो भारत भूमि की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं आज भी अपनी उपस्थिति का एहसास करा देते है बाबा के अवकाश पर प्रस्थान के लिए आज भी सरकार वो पूरी व्यवस्था करतीं हैं जो एक सैनिक के लिए ज़रूरी होता है सच इन सीमाओं की रक्षा इसी तरह से होती है 'Baba' Harbhajan Singh: Immortal soldier शीर्षक से प्रकाशित यह आलेख देखी जो रैडिफ़ न्यूज़ पर है September 15, 2006 18:05 IST "True soldiers are immortal", this popular saying appears true at least in the case of "Baba" Harbhajan Singh [Images]. "Baba" Harbhajan Singh of the Dogra Regiment died near the Nathula Pass in eastern Sikkim.

According to legend, Harbhajan Singh drowned in a glacier during the 1962 Sino-Indian War. A manhunt was launched to find him. He was found three days later and cremated with full military honours. It was said Harbhajan led the search party to his body, and later, through a dream, instructed one of his colleagues to build and maintain a shrine after him. A shrine was built at his samadhi in the hills. Army folklore holds Baba is a stickler for discipline and is known to admonish those who do not tow this line.

A camp bed is kept for him and his boots are polished and uniform kept ready every night. The sheets are reportedly crumpled every morning and boots muddy by evening. The soldier continues to draw a salary and takes his annual leave. Legend also has it that in the event of a war between India and China, Baba would warn the Indian and Chinese soldiers three days in advance.

During the flag meetings between the two nations at Nathula, the Chinese set a chair aside for the saint. Every year on September 14, a jeep departs with his personal belongings to the nearest railway station, New Jalpaiguri, where it is then sent by train to the village of Kuka, in Kapurthala district in Punjab.

A small sum is also sent to his mother each month. His name still continues in the army's payrolls, his mother has still been getting his salary cheques and he has also been given all due time bound promotions.

Accordingly, presently the late soldier is treated as honorary captain. He is granted two months annual leave every year, a berth is booked in train in his name and his portrait, uniform and other belongings are brought by army officials to his native village Kuka in Kapurthala district for availing leave.

Under this annual drill, belongings of "Baba" Harbhajan Singh were brought to Jalandhar from New Jalpaigudi by Dibrugarh Express on Thursday night.

A JCO, a Subedar and an Orderly accompanied the belongings. The family of the late soldier received the belongings at the railway station and later proceeded for their native village. On completion of the leave the same team of the army personnel will escort back the belongings to the Nathu La region.

एक और आलेख
Baba Harbhajan Singh: A story of a dead sepoy, जो Sikkim: A Himalayanreview, पर प्रकाशित है ब्लॉगर मनीष कुमार के चिट्ठे एक शाम मेरे नाम पर सफर सिक्किम का: छान्गू झील, नाथू ला और बाबा मन्दिर एक पोस्ट है कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se ** , पर एक अन्य पोस्ट [-क्या मरने के बाद भी जीवन है ]में विस्तार से हिन्दी में लिखी गयी पोस्ट को यहाँ पुन:प्रकाशित करने का दू:स्साहस कर रहा हूँ किंतु रंजू जी ने कॉपी पेस्ट वर्जित किया है सो लिंक डाले देता हूँ http://ranjanabhatia.blogspot.com/2008/01/blog-post_12.html,

शिर्डी साईं को समर्पित "बावरे-फकीरा"

A TRIBUTE TO SHIRDEE SAI BABA DEVOTIONAL ALBUM "BAWARE FAQEERA" VOICE :- *AABHAS JOSHI "STAR T.V.VOICE OF INDIA" {Jabalpur} *SANDEEPA PARE {Bhopal} MUSIC:- *SHREYASH JOSHI {Jabalpur} LYRICS:- *GIRISH BILLORE"MUKUL"{Jabalpur} sairamsairamsairamsairamsairamsairamsairamsairamsairamsairamsairamsairamsairamsairamsairamsa THIS DEVOTIONAL ALBUM WILL CONTRIBUTE FOR THE DISABLED CHILDREN SUFFERING FROM POLIO COME FORWARD FOR THIS CHARITY CAUSE & CONTRIBUTE FOR THE SUCCESS OF THE ALBUM PL.FORWARD THIS INFORMATION TO YOUR "FRIENDS/RELATIVES/ORGANISATION(S) GROUP/SAI-BHAKT ETC". ******************** FOR FURTHER DETAILS & YOUR SUGESSTIONS CONTACT [1] girishbillore@gmail.com
[4] PHONE 09926471072 [5] PHONE 09424604554 sairamsairamsairamsairamsairamsairamsairamsairamsairamsairamsairamsairamsairamsa

Tuesday, September 23, 2008

आतंकवाद बनाम कबीलियाई वृत्ति

इस पोस्ट के लिखने के पूर्व मैंने यह समझने की कोशिश की है कि वास्तव में किसी धर्म में उसे लागू कराने के लिए कोई कठोर तरीके अपनाने की व्यवस्था तो नहीं है........?किंतु यह सत्य नहीं है अत: यह कह देना कि "अमुक-धर्म का आतंकवाद" ग़लत हो सकता है ! अत: आतंकवाद को परिभाषित कर उसका वर्गीकरण करने के पेश्तर हम उन वाक्यों और शब्दों को परख लें जो आतंकवाद के लिए प्रयोग में लाया जाना है. इस्लामिक आंतकवाद , को समझने के लिए हाल में पाकिस्तान के इस्लामाबाद विस्फोट ,पर गौर फ़रमाएँ तो स्पष्ट हो जाता है की आतंक वाद न तो इस्लामिक है और न ही इसे इस्लाम से जोड़ना उचित होगा । वास्तव में संकीर्ण कबीलियाई मानसिकता का परिणाम है। भारत का सिर ऊँचा करूँगा-कहने वाले आमिरखान,आल्लामा इकबाल,रफी अहमद किदवई,और न जाने कितनों को हम भुलाएं न बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे घटना क्रम को बारीकी से देखें तो स्पष्ट हो जाता है की कबीलियाई समाज व्यवस्था की पदचाप सुनाई दे रही थी जिसका पुरागमन अब हो चुका है, विश्व की के मानचित्र पर आतंक की बुनियाद रखने के लिए किसी धर्म को ग़लत ठहरा देना सरासर ग़लत है । हाँ यहाँ ये कहा जा सकता है की इस्लामिक-व्यवस्था में शिक्षा,को तरजीह ,देने,संतुलित चिंतन को स्थापित कराने में सामाजिक एवं धार्मिक नेतृत्व असफल रहा है जिससे अच्छी एवं रचनात्मकता युक्त सोच का अभाव रहा इस्लामिक-देशों की आबादी के । डैनियल पाइप्स.की वेब साईट http://hi.danielpipes.org/ पर काफी हद तक स्पस्ट आलेख लिखे जा रहे हैं जिसका अनुवाद अमिताभ त्रिपाठी कर रहें हैं । अब भारत को ही लें तो भारत में पिछले दशकों में प्रांतीयता,भाषावाद,क्षेत्र-वाद की सोच को बढावा देने की कोशिश की जा रही है इस पर आज लगाम न लगाई गयी तो तय शुदा बात है भारतीय-परिदृश्य में भी ऐसी घटनाएं आम समाचार होंगी। आतंक को रोकने किसी भी स्थिति में किसी साफ्ट सोच का सहारा लेने की कोई ज़रूरत नहीं,आतंक वाद को रोकने बिना किसी दुराग्रह के कठोरता ज़रूरी है चाहे जितनी बार भी सत्ताएं त्यागनी पड़ें , हिंसा को बल पूर्वक ही रोका जाए।

Monday, September 15, 2008

अमिय पात्र सब भरे भरे से ,नागों को पहरेदारी

अमिय पात्र सब भरे भरे से ,नागों को पहरेदारी
गली गली को छान रहें हैं ,देखो विष के व्यापारी,
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मुखर-वक्तता,प्रखर ओज ले भरमाने कल आएँगे
मेरे तेरे सबके मन में , झूठी आस जगाएंगे
फ़िर सत्ता के मद में ये ही,बन जाएंगे अभिसारी
..................................देखो विष के व्यापारी,
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कैसे कह दूँ प्रिया मैं ,कब-तक लौटूंगा अब शाम ढले
बम से अटी हुई हैं सड़कें,फैला है विष गले-गले.
बस गहरा चिंतन प्रिय करना,खबरें हुईं हैं अंगारी
..................................देखो विष के व्यापारी,
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लिप्सा मानस में सबके देखो अपने हिस्से पाने की
देखो उसने जिद्द पकड़ ली अपनी ही धुन गाने की,
पार्थ विकल है युद्ध अटल है छोड़ रूप अब श्रृंगारी
..................................देखो विष के व्यापारी,

Friday, August 22, 2008

मोहित

अन्नू कपूर मोहित हुए आभास के अन्दर की सरस्वती को किया प्रणाम, एन डी टी वी इमेजिन पर चल रहे रियलिटी शो जुनून में इस बार जो हुआ वो किसी शो में नहीं हुआ [एडिटेड समाचार के लिए क्लिक कीजिये लिंक पर ] हमें आभास पर विश्वास तो पूरा है कि

अन्नू कपूर मोहित हुए आभास के अन्दर की सरस्वती को किया प्रणाम

आभास पे फ़िदा हुए अन्नू कपूर आभास की प्रतिभा की दीवानगी का हर तरफ़ असर दिखाई देता है. एन डी टी वी इमेजिन के बेहतरीन म्यूजिकल शो जुनून के आने वाले शो में सबसे मार्मिक और भावुक कर देने वाला दृश्य होगा आभास और अन्नू कपूर के बीच सम्मान और सराहना का आदान प्रदान बेहद भावुक किंतु संगीत के लिए प्रतिबद्ध एंकर अन्नू ने आभास की परफोर्मेंस के बाद बेहद अनोखे तरीके से की तारीफ़ जिससे प्रभावित हो आभास ने इस हस्ती के पाँव छू लिए . इस बात से बेखबर सभी आभास की प्रस्तुति और विनम्रता पे मोहित थे की अन्नू कपूर ने आभास के पाँव छुऐ..........!इस बात का आभास न तो आभास को था और न ही आडिएंस को , जजेज भी हतप्रभ हुए और अन्नू जी की ऊंचाई को ताकते रह गए सभी . की अन्नू जी ने कहा:-"बेटे,इस ग़लत फहमी में मत रहना की मैंने तुम्हें प्रणाम किया मैंने तो तुममे बसी माँ सरस्वती को प्रणाम किया है"अन्नू कपूर की ऊंचाई को नापना सबके बस में नही तभी तो यह घटना और अन्नू कपूर का कथन सबके लिए प्रेरक प्रसंग सी बन गया है .

Tuesday, August 19, 2008

क्लिक-सलाम:विश्व छायांकन दिवस पर विशेष

जबलपुर का छायांकन में योगदान उच्च स्तरीय रहा है । फोटोग्राफी ,के पुरोधाओं में शशिन यादव जी,का नाम जहाँ एक ओर बड़े सम्मान से लिया जाता है वहीं युवा छायाकारों को भी जबलपुर नहीं बसरता क्या करें इस शहर की तासीर ही ऐसी ही है। जबलपुर में फोटो पत्रकारिता के बीते दौर में जिनका नाम शिखर पर था उनमें शशिन यादव जी के अलावा कामता-सागर,जे० एस० मूर्ति,दिलीप घोष, स्वर्गीय महेंद्र चौधरी,आर० खान,नितिन पोपट,का दौर आया । इनमें दिलीप घोष जे एस मूर्ति को छोड़ सभी सीधे तौर पर अखबारी फोटोग्राफी से जुड़े थे। ब्लेक एंड व्हाइट दौर में रंगीन फोटो रोल मुंबई में साफ़ होते थे स्थानीय अखबार की ज़रूरत पूरी कराने ये छायाकार बड़ी मेहनत से प्रोग्राम के अन्तिम क्षण तक रुकते और तुंरत स्टूडियो में जा कर डेवलप करते तब तक ढेरों फोन आ चुके होते थे सम्पादकों के ।
काम मेन्यूअल होने से थोडा विलंब तो हो ही जाता था । साथ आने जाने के साधन के नाम पे थी सायकलें या किन्हीं के पास स्कूटरें, वरना रिक्सा क्या बुरा था जो आज भी मेरे शहर की पहचान है।इन पुरोधाओं के बाद दौर आया सुगन जाट,पप्पू शर्मा,रजनी कान्त यादव,अरविन्द यादव,बसंत मिश्रा,संजीव चौधरी,संतराम चौधरी,अनिल तिवारी,-आफ़रोज खान,महिला छायाकारों में विजया परांजपे ,और ............श्रीवास्तव थीं जो ज़्यादातर नारी निकुंज {नवीन दुनिया जबलपुर का सर्वाधिक लोकप्रिय परिशिश्ठ }के लिए काम करतीं थीं किंतु केवल स्वांत:सुखाय ।आज के दौर में संजय राठौर,राजेश मालवीय,जापानी,उमेश राठौर,वीरेन्द्र राजपूत,के०के०, संजय पशीने,शंकर विश्वकर्मा, सहित सारे वो जो प्रतिबद्ध हैं फोटो ग्राफी के लिए..... सबको मेरा क्लिक सलाम

Monday, June 2, 2008

:-"ख़ुद से कैसे भाग सकेगा अंतस

:-"ख़ुद से कैसे भाग सकेगा अंतस पहरेदार कड़क हैं" इस मुखड़े पे गीत लिख भेजिए अन्तिम तिथि 30 जून 2008 email:- girishbillore@gmail.com अथवा girishbillore@hotmail.com नियमों की प्रतीक्षा कीजिए मुझे आपके एक गीत की प्रतीक्षा है अन्तिम तिथि तक प्राप्त गीत प्रकाशित कर दिए जाएंगे प्रकाशित गीतों पर विशेषज्ञों की राय,(गुणांक),तथा पाठकों की राय (गुणांक) के आधार पर विजेताओं की घोषणा कर दी जावेगी ! पुरूस्कार राशी के रूप में न होकर "...........................!" के रूप में होगा !!

Saturday, May 3, 2008

कुछ तो शर्म करिए

आभास के आने की ख़बर मिली, भोपाल के रास्ते आ रहे आभास को की नानी के देहावसान की ख़बर मिली , नानी जी की अन्तिम यात्रा में शामिल हुए आभास के बाल मन पर गहरा अंतर्द्वंद चल रहा था। अश्रु थे कि रुक नहीं पा रहे थे , तभी इक प्रसंशक ने आभास की और इक जेबी डायरी बढा दी ऑटोग्राफ के लिए। आभास भौंचक था । प्रसंशकों कुछ तो..........?

Sunday, April 27, 2008

बावरे-फकीरा "BAWARE FAQEERA": बावरे फकीरा मेक

बावरे फकीरा मेक

बावरे फकीरा मेक

आशीष सक्सेना की मेहनत ,श्रेयस के संकल्प से

बावरे फकीरा पूरा हुआ

मुझे यकीन था कि आभास के सुर सह गायिका संदीपा पारे के सुरों का

साथ पाकर इस एलबम को जो ऊंचाई देंगे उसके लिए "बाबा के कृपा "

कहना ही शेष होगा,और हम कह भी क्या सकते हैं......!!

मुझे चिंता नहीं है आपका प्यार भी तो है हमारी साथ

गिरीश बिल्लोरे

Thursday, April 24, 2008

आभास को शोकाकुल है

आभास जोशी की नानी का देहावसान २३/०४/०८ को प्रात: ६:०० बजे भोपाल में हो गया, संवेदनाएं

प्रतिभा और बाज़ार

[01] प्रतिभा और बाज़ार उसकी सफलता की कहानी में केवल उसका टेलेंट ही था...? ये अर्ध सत्य इस कारण भी क्योंकि बाज़ारवाद में ये सब कुछ होता है तरक्की और विकास के शब्द सिर्फ़ व्यवसायिकता के पन्नों पे दिखाई देतें हैं । रोशनी को सलाम करता ये समय तिमिर को नहीं पूछ रहा होता है। मेरी, आपकी, यानी हम सबकी नज़र के इर्द गिर्द हजारों हज़ार प्रतिभाएं बेदम दिखाईं देतीं है ,किंतु केवल वो ही सफल होती है जो ग्लैमरस हो.यानी व्यवसायिकता के लिए मिसफिट न हो । माँ-बाप की तस्वीरें घर के बैठक खानों से लापता है,तो पूजा घर में होगी...? नहीं घर के नक्शे में पूजा घर के लायक जगह थी ही नहीं....सो बन नहीं पाया पूजा घर । जैसे ही मेरी नज़र गयी दीवार पर इक मँहगी पेंटिंग जो न तो भाई साहब के पिताजी की थी और न ही माँ की तस्वीर थी वो, इसका अर्थ ये नहीं की उनके मन में माँ - बाप के लिए ज़गह नहीं है बात दरअसल ये है कि हमारी इन महाशय पर व्यावसायिकता इस कदर हावी हुई है कि वो सब कुछ भूल गए बच्चो से भी तो कम ही मिल पातें हैं वे तो दिवंगतों को याद रखना कैसे सम्भव होगा । विष्यान्तर होने के लिए माफी चाहता हूँ ,वास्तव में जिन श्रीमान की मैं चर्चा कर रहा हूँ वे बेहतरीन चित्रकार थे, तूलिकाएं,रंग,केनवस् उनके इशारे पे चलते थे,अब ..... वो प्रतिभा गुमसुम सी है, केनवस् कलम रंग को छुए बरसों बीत गए। केवल व्यापारिक-दक्षता ही उपयोगी साबित हुई उनके जीवन के लिए । पेंसिल से चित्रकारी करते लोगों की तारीफ करनी होगी,जो व्यावसायिकता के दौर में आज भी प्रतिभा को ज़िंदा रखतें हैं । ब्लॉगर के रूप सही,कला को ज़िंदा रखना ही होगा अस भी बस भी....! अखबार,पत्रिकाएँ,विज्ञापनजीवी संचार माध्यमों के माथे दोष मढ़्ना ग़लत होगा समय ही ऐसा है कि कला साहित्य के पन्ने कम होते जा रहे हैं।

Saturday, March 29, 2008

*KHAZANA*: "लाडली-लक्ष्मी"से बालिकाओं के लिए सोच बदली है...!!"#links#links#links#links#links#links

*KHAZANA*: "लाडली-लक्ष्मी"से बालिकाओं के लिए सोच बदली है..!

आभास आज 18 साल का हों गया है

आभास को जन्म दिन की हार्दिक बधाइयां " भावों की सलाई लेकर हम शब्द बुने तुम सुर देना *********************** जीवन के सफर में मैंने भी कुछ सपन बुनें तुमको लेकर . कुछ स्वपन मेरे थे मुक्त गीत कुछ सपनों के तीखे तेवर ..? मन की पीडा जब गीत बने श्रेयस होगा तुम सुर देना ...!! ************************* आभास मुझे था जीवन में कुछ ऐसा हम कर जाएंगे देंगें इक मुट्ठी दान कभी भर-भर के झोली पाएँगें ..! जब मन इतराए बादल सा तुम सावन का रिम झिम सुर देना !! ************************** " आभास को जन्म दिन की हार्दिक बधाइयां " गिरीश चचा,सतीश हरीश,अंकुर,सोनू,श्रद्धा, चिन्मय,आस्था,अनुभा,शिवानी, एवं काशीनाथ बिल्लोरे एवं समस्त बिल्लोरे परिवार जबलपुर, के साथ बावरे फकीरा टीम,सुदर्शन परिवार,मनीष शर्मा,माधव सिंह यादव,

Sunday, March 23, 2008

उपयोग करके फैंकिए मत

आस का किसी ने जगाया था । उसने जीवन हर मोड़ पे नए नवेले मीठे-मीठे , खट्टे-खट्टे अनुभव की पोटली लेकर दिखाई दिया । वो सच्चा आदमी जब किसी का साथ देता तब डिफैन्सिव नहीं होता उसे अपना लक्ष्य स्पस्ट रूप से दिखाई दे रहा था। चलिए उस आदमी को नाम दे देतें हैं , उसका नाम आलू चमन था......अपना खून पसीना रामलाल को सफल करने में गिराता रहा । रामलाल अपनी जिन्दगी के साधारण स्तर से आजिज़ आ गया था , हर और आंशिक सफलता और क्विंटल भर असफलताएं लिए ख़ाक छानता । आलू चमन की मदद से आगे और आगे बढ़ता अब भूल गया लगता है रामलाल । ऐसे राम लालों की कमी कतई नहीं । इतने मकसद परस्तो,डिफेंसिव-खिलाडियों में कहीं आप तो नहीं यदि आप हैं तो आज कोशिश कीजिए उस मोटी कैंचुली से बाहर निकलनें की । शायद व्यावसायिकता के दौर से ,इंसानियत को बचा लाने में सफल होगें हम और आप

Sunday, March 16, 2008

होली तो ससुराल

होली तो ससुराल की बाक़ी सब बेनूर सरहज मिश्री की डली,साला पिंड खजूर साला पिंड-खजूर,ससुर जी ऐंचकताने साली के अंदाज़ फोन पे लगे लुभाने कहें मुकुल कवि होली पे जनकपुर जाओ जीवन में इक बार,स्वर्ग का तुम सुख पाओ..!! ######### होली तो ससुराल की बाक़ी सब बेनूर न्योता पा हम पहुंच गए मन संग लंगूर, मन में संग लंगूर,लख साली की उमरिया मन में उठे विचार,संग लें नयी बंदरिया . कहत मुकुल कविराय नए कानून हैं आए दो होली में झौन्क, सोच जो ऐसी आए ...!! ######### होली तो ससुराल की ,बाक़ी सब बेनूर देवर रस के देवता, जेठ नशे में चूर , जेठ नशे में चूर जेठानी ठुमुक बंदरिया ननदी उम्र छुपाए कहे मोरी बाली उमरिया . कहें मुकुल कवि सास हमारी पहरेदारिन ससुर देव के दूत जे उनकी हैं पनिहारिन..!! ######### सुन प्रिय मन तो बावरा, कछु सोचे कछु गाए, इक-दूजे के रंग में हम-तुम अब रंग जाएं . हम-तुम अब रंग जाएं,फाग में साथ रहेंगे प्रीत रंग में भीग अबीरी फाग कहेंगे ..! कहें मुकुल कविराय होली घर में मनाओ मंहगे हैं त्यौहार इधर-उधर न जाओ !!

आभार

स्पन्दन के लिए बेजी का कैसे आभार करें

नौ महीने गर्भ में आरंभ वात्सल्य ये सभी पोस्ट काबिले सम्मान हैं...

आभार

Thursday, March 6, 2008

महिला दिवस पर एक चिंतन "चिंता नहीं चिंतन की ज़रूरत है"

महिला सशक्तिकरण की चिंता करना और समाज के समग्र विकास में महिलाओं की हिस्सेदारी पर चिंतन करना दो अलग-अलग बिन्दु हैं ऐसा सोचना बिलकुल गलत है । लिंग-भेद भारतीय परिवेश में मध्य-कालीन देन है किन्तु अब तो परिस्थितियाँ बदल रहीं है किन्तु बदलती तासीर में भी महिला वस्तु और अन्य वस्तुओं के विक्रय का साधन बन गयी है. अमूल माचो जैसे विज्ञापन इसके ताज़ा तरीन उदाहरण हैं .क्या विकास के इस फलक पर केवल विज्ञापन ही महिलाओं के लिए एक मात्र ज़गह है...? ऑफिस में सेक्रेटरी,क्लर्क,स्टेनो,स्कूलों में टीचर,बस या इससे आगे भी-"आकाश हैं उनके लिए॥?"हैं तो किन्तु यहाँ सभी को उनकी काबिलियत पे शक होता है .होने का कारण भी है जो औरतैं स्वयम ही प्रदर्शित करतीं हैं जैसे अपने आप को "औरत" घोषित करना यानी प्रिवलेज लेने की तैयारी कि हम महिला हैं अत:...हमको ये हासिल हों हमारा वो हक है , .... जैसा हर समूह करता है।.....बल्कि ये सोच होनी चाहिए कि हम महिलाएं इधर भी सक्षम हैं...उस काम में भी फिट...! यहाँ मेरा सीधा सपाट अर्थ ये है की आप महिला हैं इसका एहसास मत .होने दीजिए ...सामाजिक तौर पे स्वयम को कमजोर मत सिद्ध करिए ... वरन ये कहो की-" विकास में में समान भागीदार हिस्सा हूँ.....!" दरअसल परिवार औरतों को जन्म से औरत होने का आभास कराते हैं घुट्टी के संस्कार सहजता से नहीं जाते ।आगे जाते-जाते ये संस्कार पुख्ता हो जातें हैं।मसला कुल जमा ये है कि महिला के प्रति हमारी सोच को सही दिशा की ज़रूरत है...वो सही दिशा है समग्र विकास के हिस्से के तौर पर महिला और पुरुष को रखने की कोशिश की जाए॥

सुनीता शानू जी.....ने.....महिला दिवस पर एक सामयिक रचना ......ब्लाग पर पोस्ट की है एक क्लिक कीजिए कविता केलिए मै और तुम उनके ब्लोंग पर यहाँ क्लिक करके देखिए "मन पखेरू फ़िर उड़ चला"

Saturday, March 1, 2008

रामकृष्ण गौतम

http://www.koitohoga.blogspot.com/ JABALPUR /ஜபல்பூர் /ಜಬಲ್ಪುರ್ /Jఅబల్పూర్ यानी अपने जबलैपुर या जबल+ई+पुर के रामकृष्ण गौतम का ब्लॉग "Least but not the Last_ _ _! ! !" देखने लायक तो है ही बेहतरीन भी है...... !! बधाइयां

Thursday, February 28, 2008

मध्य-प्रदेश लेखक संघ ने प्रस्ताव आहूत किए

म० प्र० लेखक संघ भोपाल ने अपने परिपत्र में कार्यकारणी की घोषणा करते हुए २००८ के लिए निम्न लिखित सम्मानों के प्रस्ताव आहूत किए हैं:-
  • अक्षर-आदित्य-सम्मान, आयु-सीमा ६० वर्ष,
  • पुष्कर-सम्मान,६० वर्ष तक की आयु सीमा
  • देवकी-नंदन-सम्मान,३५-५० , आयु वर्ग के रचनाकारों के लिए,
  • काशी-बाई-मेहता-सम्मान,किसी भी आयु की महिला लेखिका,के लिए,
  • कस्तूरी देवी चतुर्वेदी,लोक-भाषा-सम्मान,म०प्र० की लोक भाषा, की महिला साहित्यकार को , योग्य प्रस्ताव के अभाव में पुरुष साहित्यकार के नाम पर विचार किया जाएगा ,
  • माणिक वर्मा,व्यंग्य-सम्मान,
  • चंद्रप्रकाश जायसवाल,बाल-साहित्य-सम्मान,
  • पार्वती देवी मेहता अहिन्दी भाषी हिन्दी-साहित्यकार
  • डा० संतोष कुमार तिवारी -समीक्षा सम्मान, ६० वर्ष आयु से अधिक आयु के समीक्षक को , शिथिलाताएं संभावित
  • हरिओम शरण चौबे गीतकार सम्मान,
  • कमला देवी लेखिका सम्मान
  • मालती वसंत सम्मान [द्वि-वार्षिक ] १८ वर्ष आयु वर्ग की युवा लेखिका को
  • सारस्वत-सम्मान,
  • अमित रमेश शर्मा हास्य-व्यंग्य के लिए

प्रस्ताव के लिए म०प्र० के साहित्यकार,जिला एकांशों के पदाधिकारियों से सम्पर्क कर सकते हैं । अथवा निम्न लिखित पतों पर सम्पर्क

कीजिए:-

  1. श्री बटुक-चतुर्वेदी ,१४/८,परी-बाज़ार,शाहाज़हानाबाद, भोपाल,म०प्र०
  2. गिरीश बिल्लोरे मुकुल एकांश अध्यक्ष , जबलपुर ,एकांश,९६९/ए-२,गेट न० ०४, जबलपुर

[ क्रमांक २ से केवल प्रस्ताव हेतु प्रपत्र -प्राप्ति हेतु सम्पर्क कीजिए]

Monday, February 25, 2008

एक ख़त : पूर्णिमा वर्मन जी के नाम

http://abhivyakti-hindi.org/ <= लिंक पर उपलब्ध अभिव्यक्ति-अनुभूति की संपादिका को आज लिखे ख़त को सभी के लिए पोस्ट करना ज़रूरी है.....पूर्णिमा जी सादर अभिवादन आज ही जबलपुर में हिन्दी-साहित्य सम्मेलन जबलपुर जिला इकाई बैठक में आपकी चर्चा हुई। मो। मोइनुद्दीन "अतहर",प्रदीप"शशांक", सनातन बाजपेई जी,एवं श्री राम ठाकुर दादा आदि को प्राप्त सम्मान के लिए उन्हें शुभकामना देने का अवसर भी था , आज अभी-अभी अभिव्यक्ति पर छपी इस सूचना => "ये रचनाएँ मौलिक तथा अप्रकाशित होनी चाहिए। इन्हें किसी भी पत्र-पत्रिका, या वेब साइट अथवा ब्लॉग पर पहले प्रकाशित नहीं होना चाहिए। यदि बाद में यह पता चला कि रचना मौलिक नहीं थी या पहले प्रकाशित हो चुकी थी तो मानदेय की धनराशि का भुगतान रोका जा सकता है। यदि भुगतान कर देने के बाद इनके पूर्व प्रकाशित होने की जानकारी मिलती है तो भविष्य में उस कवि लेखक की रचनाओं का प्रकाशन अभिव्यक्ति व अनुभूति में हमेशा के लिए रोका जा सकता है।" के लिए आपके प्रति कृतज्ञ हूँ , आपकी इस पहल के बाद अन्य वेब-पत्रिकाएँ इसी तरह अलर्ट रहेगीं तो साहित्यिक-चौर्य-कर्म पर प्रतिबन्ध लगेगा। अंतर जाल पर साहित्य को लेकर भी आज बेहद प्रभावी चर्चा हुई बार बार आपका ज़िक्र सुन कर अच्छा लगा . शुभ कामनाओं के साथ गिरीश बिल्लोरे मुकुल प्रति, पूर्णिमा वर्मन, संपादक ,अभी-अनु, प्रतिलिपि:- वेब-पत्रिकाओं के संपादक गण

Sunday, February 24, 2008

बावरे-फकीरा,

किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी !!

Feb 21, 05:05 pm फिरोजपुर [जागरण संवाददाता]। ंवो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी.. हे राम. व आदमी आदमी को क्या देगा जो भी देगा खुदा देगा.. जैसी कालजयी गजलें लिखने वाले मशहूर शायर सुदर्शन फाकिर सोमवार को इस दुनिया से रुखसत हो लिए। अफसोस कि पंजाब को एक अलग पहचान देने वाले इस शख्स को पंजाबियों और पंजाब ने नहीं पहचाना। वर्ष 1937 में फिरोजपुर के गुरुहरसहाय कस्बे के रत्ताखेड़ा गांव में डाक्टर बिहारी लाल कामरा के यहां जन्म लेने वाले सुदर्शन फाकिर के परिवार में दो अन्य भाई भी थे। बड़े भाई का देहांत हो चुका है। जालंधर में रहने वाले छोटे भाई विनोद कामरा के यहां फाकिर साहब ने जिंदगी के आखिरी लम्हे बिताए। फाकिर साहब के अजीज मित्रों कहना है कि उनकी याददाश्त काफी तेज थी। जिस शख्स से वह मिल लेते थे, उसे दोबारा अपना नाम नहीं बताना पड़ता था। यह अलग बात है कि फाकिर साहब को उनके घर का पता कभी याद नहीं रहा। वर्ष 1970 से पहले जालंधर में आल इंडिया रेडियो में नौकरी करने वाले फाकिर साहब को वहां मन नहीं लगा। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और मुंबई चले आए। 2005 में वह मुंबई से वापस आकर जालंधर में अपने छोटे भाई के यहां रहने लगे। सत्तर के करीब गजल लिखने वाले फाकिर की प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन दिनों बेगम अख्तर सिर्फ पाकिस्तान के शायरों की गजल ही गाया करती थीं। मगर, फाकिर साहब पहले भारतीय शायर हैं, जिनकी लिखी गजल बेगम अख्तर ने बुलाकर ली और अपनी आवाज दी। वह मशहूर गजल थी 'इश्क में गैरते जज्बात नेरोने न दिया..'। बाद में चित्रा सिंह ने भी इसे गाया था। मोहम्मद रफी ने उनकी गजल 'फलसफे इश्क में पेश आए हैं सवालों की तरह..' गाकर दुनिया में धूम मचा दी। इस नज्म ने फाकिर को नई पहचान दी। जब गजल गायक जगजीत सिंह ने उनके द्वारा लिखी गजल 'वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी.' गाया उसके बाद फाकिर केनाम का डंका दुनिया में ऐसा गूंजा कि उसकी खनक आज भी सुनाई देती है। उनके द्वारा लिखित गजल 'जिंदगी मेरे घर आना..' गाकर भूपिंदर सिंह ने फिल्म फेयर अवार्ड जीता। वहीं गुलाम अली ने 'कैसे लिखोगे मोहब्बत की किताब तुम तो करने लगे पल-पल का हिसाब..' गाकर गजलों के इस सम्राट को सलाम किया था। फाकिर का अंतिम शेर जो दुनिया के सामने नहीं आ सका, वह था 'लाश मासूम की हो या कि कातिल की, जनाब हमने अफसोस किया है..'। वर्ष 1982 में गजल की एक कैसेट रिलीज की गई थी, उसमें मीरा व कबीर के सात भजन थे और आठवां भजन फाकिर साहब ने लिखा था। वहीं फाकिर साहिब का एक गीत 'आखिर तुम्हें आना है जरा देर लगेगी..' भी काफी पसंद किया गया था। इसका बालीवुड फिल्म यलगार के लिए इस्तेमाल किया गया था। http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_4198016/ पर सम्पूर्ण समाचार उपलब्ध है। हिंद-युग्म के राजीव रंजन,शैलेश जी , फाकिर साहब के जीवन और उनको सूचना संसार से उपेक्षित रहने को लेकर दु:खी हें जिन्दगी से बात करतीं गजल,जिन्दगी की बात करती ग़ज़ल, और जब सुदर्शन जी की शायरी ,बेगम अख्तर की आवाज़ के रथ पे सवार लगती कोई साम्राज्ञी की शोभा यात्रा हो, नए दौर में जगजीत सिंह के स्वरों के जारी हमारे कानों से सीधे दिल मी उतर वहीं बस गयी लगती फाकिर साहब की गज़लें. यूनुस खान ने बताया की सुदर्शन फाकिर इंटरव्यू, आत्म प्रकाशन जैसी बातों से दूर ही रहतें थे . एक गंभीर शायर जो आम बोल चाल के शब्दों को ग़ज़ल में आसानी से बदल देने वाले सुदर्शन फाकिर नहीं रहे वो बात कैसे लाते थे सादगी अपने कलाम में सुदर्शन फाकिर इस बात को समझने के लिए अब केवल हमको निर्भर रहना होगा उनकी रचनाओं पर किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी मुझ को एहसास दिला दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी मेरे रुकने से मेरी साँसे भी रुक जायेंगी फ़ासले और बड़ा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी ज़हर पीने की तो आदत थी ज़मानेवालो अब कोई और दवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी चलती राहों में यूँ ही आँख लगी है 'फ़ाकिर' भीड़ लोगों की हटा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी v सुदर्शन फ़ाकिर की रचनाएँ आदमी आदमी को क्या देगा आज के दौर में ऐ दोस्त आज तुम से बिछड़ रहा हूँ अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें अहल-ए-उल्फ़त के हवालों पे चराग़-ओ-आफ़ताब ग़ुम ढल गया आफ़ताब ऐ साक़ी दिल के दीवार-ओ-दर पे क्या देखा दुनिया से वफ़ा करके फ़ल्सफ़े इश्क़ में पेश आये ग़म बढ़े आते हैं हम तो यूँ अपनी ज़िन्दगी से मिले इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात जब भी तन्हाई से घबरा के जिस मोड़ पर किये थे किसी रंजिश को हवा दो कुछ तो दुनिया की इनायात मेरे दुख की कोई दवा न करो मेरी ज़ुबाँ से मेरी दास्ताँ पत्थर के ख़ुदा पत्थर के सनम फिर आज मुझे तुम को सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं शायद मैं ज़िन्दगी की सहर शैख़ जी थोड़ी सी पीकर आइये उल्फ़त का जब किसी ने उस मोड़ से शुरू करें ये दौलत भी ले लो ये शीशे ये सपने ज़ख़्म जो आप की इनायत है ज़िन्दगी तुझ को जिया है वो काग़ज़ की कश्ती दिल तोड़ दिया पत्थर के ख़ुदा गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" 9424358167 girishbillore@gmail.com

other link's http://www.hindimedia.in/content/blogsection/6/66/ ,http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_4198016/

Friday, February 22, 2008

पंकज गुलुश ने भी याद किया तिरलोक जी को ,मुझे भी याद आ रहे हें....!

एक व्यक्तित्व जो अंतस तक छू गया है । उनसे मेरा कोई खून का नाता तो नहीं किंतु नाता ज़रूर था । कमबख्त डिबेटिंग गज़ब चीज है बोलने को मिलते थे पाँच मिनट पढ़ना खूब पङता था । लगातार बक-बकाने के लिए कुछ भी मत पढिए ,1 घंटे बोलने के लिए चार किताबें , चार दिन तक पढिए, 5 मिनट बोलने के लिए सदा ही पढिए, ये किसी प्रोफेसर ने बताया था याद नहीं शायद वे राम दयाल कोष्टा जी थे ,सो मैं भी कभी जिज्ञासा बुक डिपो तो कभी पीपुल्स बुक सेंटर , जाया करता था। पीपुल्स बुक सेंटर में अक्सर तलाश ख़त्म हों जाती थी, वो दादा जो दूकान चलाते थे मेरी बात समझ झट ही किताब निकाल देते थे। मुझे नहीं पता था कि उन्होंनें जबलपुर को एक सूत्र में बाँध लिया है। नाम चीन लेखकों को कच्चा माल वही सौंपते है इस बात का पता मुझे तब चला जब पोस्टिंग वापस जबलपुर हुयी। दादा का अड्डा प्रोफेसर हनुमान वर्मा जी का बंगला था। वहीं से दादा का दिन शुरू होता सायकल,एक दो झोले किताबों से भरे , कैरियर में दबी कुछ पत्रिकाएँ , जेब में डायरी, अतरे दूसरे दिन आने लगे मलय जी के बेटे हिसाब बनवाने,आते या जाते समय मुझ से मिलना न भूलने वाले व्यक्तित्व ..... को मैंने एक बार बड़ी सूक्ष्मता से देखा तो पता चला दादा के दिल में भी उतने ही घाव हें जितने किसी युद्धरत सैनिक के शरीर,पे हुआ करतें हैं। कर्मयोगी कृष्ण सा उनका व्यक्तित्व, मुझे मोहित करने में सदा हे सफल होता..... ठाकुर दादा,इरफान,मलय जी,अरुण पांडे,जगदीश जटिया,रमेश सैनी,के अलावा,ढेर सारे साहित्यकार के घर जाकर किताबें पढ़वाना तिरलोक जी का पेशा था। पैसे की फिक्र कभी नहीं की जिसने दिया उसे पढ़वाया , जिसके पास पैसा नहीं था या जिसने नही दिया उसे भी पढवाया । कामरेड की मास्को यात्रा , संस्कार धानी के साहित्यिक आरोह अवरोहों , संस्थाओं की जुड़्न-टूटन को खूब करीब से देख कर भी दादा ने इस के उसे नहीं कही। जो दादा के पसीने को पी गए उसे भी कामरेड ने कभी नहीं लताडा कभी मुझे ज़रूर फर्जी उन साहित्यकारों से कोफ्त हुई जिनने दादा का पैसा दबाया । कई बार कहा " दादा अमुक जी से बात करूं...? रहने दो ...? यानी गज़ब का धीरज । सूरज राय "सूरज" ने अपने ग़ज़ल संग्रह के विमोचन के लिए अपनी मान के अलावा मंच पे अगर किसी से आशीष पाया तो वो थे :"तिरलोक सिंह जी "। इधर मेरी सहचरी ने भी कर्मयोगी के पाँव पखार ही लिए। हुआ यूँ कि सुबह सवेरे दादा मुझसे मिलने आए किताब लेकर आंखों में दिखना कम हों गया था,फ़िर भी आए पैदल । सड़क को शौचालय बनाकर गंदगी फैलाने वाले का मल उनके सेंडिल में.... मेन गेट से सीढियों तक गंदगी के निशान छपाते ऊपर आ गए दादा. अपने आप को अपराधी ठहरा रहे थे जैसे कोई बच्चा गलती करके सामने खडा हो. इधर मेरा मन रो रहा था कि इतना अपनापन क्यों हो गया कि शरीर को कष्ट देकर आना पड़ा दादा को .संयुक्त परिवार के कुछ सदस्यों को आपत्ति हुयी की गंदगी से सना बूढा आदमी गंदगी परोस गया गेट से सीडी तक . सुलभा के मन में करूणा ने जोर मारा . उनके पैर धुलाने लगी . मानव धर्म के आधार में करुणा का महत्त्व सुलभा से बेहतर कौन समझ पाया होगा तब. . तिरलोक जी का आशीर्वाद लेकर सुलभा ने जाने कितना कुछ हासिल किया मुझे नहीं मालूम . मेरे और अन्य साहित्यकारों के बीच के सेतु तिरलोक जी फिर एकाध बार ही आए अब तो बस आतीं हैं उनकी यादें दस्तक देने मन के दरवाजे तक ऐसा सभी साथी महसूस करते हैं. उनकी परम्परा को आगे जारी रखने के संकल्प के साथ जबलपुर के साहित्यकारों के दरवाज़े दस्तक देतें हैं मनोहर बिल्लोरे जी Ek koyala by Manohar Billore,

सत्य के साथ सृजनगाथा

तनवीर जी की पोस्ट हटाई सृजनगाथा ने

रायपुर से वेब पर प्रकाशित होने वाली सृजनगाथा के संपादक जी ने सत्यनिष्ठ होने का परिचय देकर साहित्य और न्याय का समर्तन किया और तनवीर जाफरी के नाम से प्रकाशित मेरी रचना "जीवन की बंजर भूमि में " लिंक ये थे => http://www.srijangatha.com/Permanent%20matter/vichar-withi.htm& http://www.srijangatha.com/2007-08/july07/vicharvithi.htm , हटा दिया है ।

संपादकीय कार्यालयः एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, 492001 ई-मेलः srijangatha@gmail.com,

चलते चलते इसे ज़रूर पढिए :-"सृजनगाथा : प्रसंगवश "

आप सभी इस दिशा में जागरूक रहिए,कहीं कोई........

शुभ रात्री

Thursday, February 21, 2008

साहित्यिक चोरी और हम सब

JEEVAN KEE BANJAR BHOOMI ,को दूसरे नाम से सृजनगाथा ने छापा या लेखक तनवीर ने छपवाया ये और बात है मुख्य मामला तो ये है कि मैंने साहित्यिक चोरी के खिलाफ़ पूरी ताक़त से मैंने आवाज़ उठाई ,मेरे करीब के लोग मुझे नसीहत देते नज़र आ रहे हैं। "तनवीर जाफरी ने बताया कि सृजनगाथा को नही भेजा आलेख उधर जयप्रकाश "मानस"जी ने ये देख http://www.srijangatha.com/Permanent%20matter/vichar-withi.htm& http://www.srijangatha.com/2007-08/july07/vicharvithi.htm कर उनसे सम्पर्क किया तो यही बात मानस जी ने सुनी फोन पर । अब चोरी है या तकनीकी गलती बात इस मुद्दे पे चली गयी सब को लग रहा है। वास्तव में तनवीर जाफरी ने लिखित जवाब न देकर अपने आप को बचाने की कोशिश भले की हों किन्तु बेनकाब हों गए बेचारे । चलो अब बहस शुरू करें असली वाली जिस देश में साहित्य मठाधीशी छाया में पनप रहा हों वहाँ चोरी चकारी संभाव संभव है । किन्तु हम चुप रहकर दोषी हैं । डाक्टर संध्या जैन श्रुति ,डाक्टर श्रीराम ठाकुर "दादा" ने बताया कि उनके आलेख,कवितायेँ भी इसी तरह चोरी गयी.....! उधर भोपाल के मशहूर पत्रकार विनय उपाद्याय की सहचरी की प्रकाशित रचना भी छपने उन्हीं के अखबार में छपने आयी । मेरा लक्ष्य "साहित्य में चोरी " के खिलाफ़ सभी साहित्य कारों की एक जुटता दर्शित करना है है।

JEEVAN KEE BANJAR BHOOMI

बी. बी. सी. उवाच

'जी स्पॉट का पता लगाया जा सकता है' इस पर मेरे नेटिया दोस्त ने कहां:- किसे फुरसत है फुरसत होते ही नींद लग जाती है....?

एलबम

Wednesday, February 20, 2008

जीवन की बंजर भूमि में

सम्बंधों की व्यावसायिकता और व्यवसायिकता के लिये सम्बंधों के लिये जाने जाना वाला यह समय कुल मिलाकर जड़ता का समय है। जीवनों के बीच केवल सम्बंध शब्द के अर्थ को समझना है तो थोड़ा सा बाजारवाद पर नज़र डालें। मैं यदि एक वस्तु बेच रहा हूँ तो ये बाजारवाद आप के लिये मुझमें केवल एक खरीददार का भाव पैदा कर देना होता है और आज इसकी खास ज़रूरत है। यदि विक्रेता के तौर पर यदि मैं यह कर सका तो तय है कि मैं सफल हूँ, व्यवसायिकता के लिये योग्य हूँ। तुमसे मेरा न कोई लेना देना था, न रहेगा, रहेगी तुम्हारे पास मेरी बेची हुई वस्तु और मेरे पास तुम्हारा पैसा जो कल पूँजी बन कर निगलने को आतुर होगा - समूचे मानव मूल्य। घबराईए मत बदलते दौर में पूँजीवाद के बारे में मैं नकारात्मक नहीं हूँ। मैं तो सम्बंधों की व्यवसायिकता बनाम व्यवसायिकता के लिये सम्बंध पर एक विमर्श करना चाहता हूँ। प्रथमत: सफल प्रोफेशनल्स के मामले में आप सहमत हो ही गए होगें। नहीं तो अब हो जाएंगे- एक बार एक अधिकारी ने सम्पूर्ण उर्जा का दोहन कर उसके मातहत को जाते-जाते कहा- “तुमसे मेरे बेहतरीन प्रोफेशनल रिलेशन थे, इसके अलावा और कुछ नहीं।” सम्बंधों का रसायन समझ मातहत ने अब अपनी क्षमता और भावात्मकता को पृथक-पृथक कर दिया। क्षमता के सहारे व्यवसायिक व्यापारिक सम्बंधों का निवर्हन करता- उसके मन में अब अपने संस्थान के लोगों से प्रबंधन से सिर्फ केवल व्यवसायिक सम्बंध हैं। यह तो संस्थानों की बात है। यहाँ यह एक हद तक जायज है। हद तो तब हो गई- संवेदनाओं की वकालत करने वाला एक शख्स -शहर में अपने अव्यवसायिक होने का डिण्डौरा मण्डला से डिण्डौरी तक पीट मारा। वो और उसके चेले-चपाटी जुट गए, अव्यवसायिकता की आड़ में व्यवसायिकता के ताने-बाने बुनने। सफल भी रहे- बहुतेरों को अपने सौम्य व्यक्तित्व के सहारे बेवकूफ बनाने में। हम जैसे कुछ मूर्ख नहीं बने, वो उसके लिये भात का कंकड़ ज़रूर बने। सुधि पाठकों - हमारे इर्द गिर्द अब केवल ऐसे लोग ही रह गए हैं उन लोगों की सूची कम होती जा रही है। जो मानवीय गुणों के आधार पर सम्बंध बनाते हैं। कमोवेश सियासत में भी यही सब कुछ है उन भाई ने बड़ी गर्मजोशी से हमारा किया। माँ-बाबूजी ओर यहाँ तक कि मेरे उन बच्चों के हालचाल भी जाने जो मेरे हैं हीं नहीं। जैसे पूछा- “गुड्डू बेटा कैसा है।” “भैया मेरी 2 बेटियाँ हैं।” “अरे हाँ- सॉरी भैया- गुड़िया कैसी है, भाभी जी ठीक हैं। वगैरा-वगैरा। यह बातचीत के दौरान उनने बता दिया कि हमारा और उनका बरसों पुराना फेविकोलिया-रिश्ता है। हमारे बीच रिश्ता है तो जरूर पर उन भाई साहब को आज क्या ज़रूरत आन पड़ी। इतनी पुरानी बातें उखाड़ने की। मेरे दिमाग में कुछ चल ही रहा था कि भाई साहब बोल पड़े - “बिल्लोरे जी चुनाव में अपन को टिकट मिल गया है।” “कहाँ से, बधाई हो सर” “.... क्षेत्र से” “मैं तो दूसरे क्षेत्र में रह रहा हूँ। यह पुष्टि होते ही कि मैं उनके क्षेत्र में अब वोट रूप में निवास नहीं कर रहा हूँ। मेरे परिवार के 10 वोटों का घाटा सदमा सा लगा उन्हें- बोले – “अच्छा चलूं जी !” पहली बार मुझे लगा मेरी ज़िंदगी कितनी बेकार है, मैं मैं नहीं वोट हूं। ये आलेख तनवीर जाफरी ने अपने नाम से या संपादक सृजनगाथा जयप्रकाश "मानस "ने तनवीर के नाम से "सृजनगाथा में छाप दिया मामला मोसेरों का है किन्तु मेरे घर से चोरी हुई है ये पक्की बात है "तनवीर जाफरी ने बताया कि सृजनगाथा को नही भेजा आलेख": "

आभास जबलपुर में

स्थानीय समाचार पत्रों से पता चला कि आभास आज जबलपुर आने वाला है तीन दिन पहले जितेन्द्र भाई बता रहे थे कि आभास का जबलपुर आने के प्रोग्राम की जानकारी उनको नहीं है....? आभास का अचानक आना तो नहीं किन्तु सूचना अखबार ने दी ये सोचने वाली बात है.....! कोई बात नहीं बडे शहरों में छोटी बातें होती रहती है समस्त सदस्य आभास जोशी स्नेह मंच का स्नेह बरकरार रहेगा

Saturday, February 9, 2008

upalabdh hain: बावरे फकीरा के वितरण अधिकार

अगर कोई म्यूजिक कम्पनी अपाहिज बच्चों की मदद के लिए बनाए गए इस "साई-भक्ति"एलबम के वितरण अधिकार खरीदना चाहे मेरा सौभाग्य होगा। यदि आभास जोषी ने इस एलबम को इस संकल्प के लिए कि "गरीब पोलियो ग्रस्त बच्चों की मदद की जाए " सोचकर अपने सुर दिए तो मैं नहीं समझता कि कोई और भी इस मामले में पीछे रहेगा।आप हमारे इस संकल्प में सहयोग कीजिए......हम प्रतीक्षा रत हें...... निवेदक

संगीतकार: श्रेयस जोषी , गीतकार:गिरीश बिल्लोरे मुकुल

फोन:09424358167,09926471072,

MAIL: girishbillore@gmail.com

Friday, February 8, 2008

सो कॉल्ड सोशल-वर्कर्स ज़रा :-"आशीष ठाकुर से सीखो !"

सो कॉल्ड शोशल वर्कर ज़रा :-"आशीष ठाकुर से सीखो !" समाज सेवको अँगुली कटा के महाराणा प्रताप बनने वाले नेताओं, समाज सेवा के समाचारों की पेपर कटिंग लेकर जमाने भर को दिखाने वालो , सरकार को दिन भर गरियाने वालो ,सब कान खोल के सुन लो "आशीष ठाकुर " जबलपुर की शान है.... जो न तो पुरूस्कार न तो सम्मान और न ही सराहना के लिए काम,करते है बस अंतरात्मा की आवाज़ बेसहारा , बे जुबां , बेनाता, देहों को पांच तत्व में मिलाने "शव-दाह" की जिम्मेदारी लेते हें , ६ वर्षों से जारी ये सिलसिला अब तक रूका नहीं सरकार आप आशीष के लिए क्या सोच रहे है...मुझे नही मालूम , लेकिन मेरा मन आशीष की समाज सेवा का मुरीद हों गया है॥ एक पुलिस कर्मी का बेटा मेग्मा कम्पनी का एग्जीक्यूटिव आशीष ने १००० बेसहारा-बेनाता देहों का अन्तिम संस्कार किया लोग समझतें हैं "ये सिर्फ आशीष की ड्यूटी है ...!" धर्म,वर्ग,भाषा,जाति, राजनीति के नाम पे हंगामा करने वालो अब तो चेतो आशीष से सीखो सच्ची समाज सेवा.....ये सलाह है आपके लिए मेरे लिए सबके लिए । लोग बाग़ आशीष के बारे में क्या सोचते हें मुझे नही मालूम मैं उनको देवदूत कहूं यकीन करने आप उनसे बात कर सकतें है ०९३००१२२२४२ पर । जबलपुर के इस साहस को सलाम ........ राम.....राम......

Thursday, February 7, 2008

" विधि आयोग ने भारत में लड़कों की शादी की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष

नई दिल्ली। विधि आयोग ने भारत में लड़कों की शादी की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष करने की सिफारिश की है।आयोग के अघ्यक्ष न्यायमूर्ति ए.आर. लक्ष्मण ने विधिमंत्री हंसराज भारद्वाज को उत्तराधिकार कानून और बाल विवाह के बारे में आज यहां सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में यह सिफारिश की है।आयोग के विशेषज्ञ कीर्ति सिंह ने पत्रकारों से बातीचत में कहा कि 18 वर्ष के बाद जब लड़के वोट दे सकते हैं और अन्य फैसले ले सकते हैं, तो फिर शादी के लिए 21 वर्ष तक इंतजार करने की बात तर्कसंगत नहीं है और न ही इसका कोई वैज्ञानिक आधार है।विशेषज्ञों ने यह सिफारिश भी की है कि 16 वर्ष से कम आयु की लड़की के साथ यौन संबंध को अपराध माना जाना चाहिए। भले ही वह शादीशुदा हो या नहीं।अगर सरकार आयोग की सिफारिश स्वीकार कर लेता है, तो 16 साल से कम आयु की पत्नी के साथ शारीरिक सबंध स्थापित करने वाले व्यक्ति को आरोपित किया जा सकता है। मौजूदा कानून के तहत 15 वर्ष से कम उम्र की शादीशुदा महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाना अपराध है।रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय कानून में उत्तराधिकार का रिश्तों के आधार पर वर्गीकरण किया गया है। न्यायमूर्ति लक्ष्मण ने कहा हिन्दू उत्तराधिकार कानून 1956 में तीन वर्ष पूर्व किए गए संशोधन में पुत्रियों को संपत्ति में बराबर का अधिकार दिया गया था। लेकिन ऐसा करते समय उत्तराधिकारी की कुछ श्रेणियों को नजरअंदाज कर दिया गया। आयोग ने यह स्वीकार किया कि कानून में कुछ खामियां रह गयी हैं।आयोग की सिफारिशें अनुसंधान समूह की रिपोर्ट का नतीजा-आयोग की ये सिफारिशें एक अनुसंधान समूह की रिपोर्ट के बाद सामने आई हैं, जिसमें कहा गया है कि बाल विवाह गैर कानूनी घोषित किए जाने के बाद भी देश के तीन बड़े राज्यों- मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और राजस्थान में यह बड़े पैमाने पर जारी है।दिल्ली स्थित अनुसंधान समूह ‘सेंटर फॉर सोश्यल रिसर्च’ की 3 फरवरी को प्रकाशिक रिपोर्ट में कहा गया है- “ऐसे लोग जिनके समुदायों में अभी भी बालविवाह का प्रचलन है उनमें से 77.2 फीसदी मध्यप्रदेश से हैं, 41 फीसदी राजस्थान से हैं और 10 फीसदी उत्तरप्रदेश से हैं”।विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर डाला है कि बालविवाह से बच्चों विशेष रूप से बालिकाओं, जो घरेलू हिंसा और यौन शोषण का शिकार हो रही हैं, के विकास पर बुरा असर पड़ रहा है। बालविवाह के चलते बालिकाएं शिक्षा के अधिकार से भी वंचित रह जाती हैं।

Tuesday, January 15, 2008

औरतें ...?

तुम् को हक नहीं
धर्म के उपदेश देने का ।
जीने के सन्देश देने का ।
तुम् केवल औरत हों तुम् केवल अनुगमन करो.....!
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तुम,और तुम्हारी सुन्दरता
हमारी संपदा .... !
तुम से हमारी सत्ता प्रूफ़ होती है !
तुम सत्ता में गयीं तो आती है आपदा ....!
तुम केवल स्वपन देखो शयन करो ........
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तुम पद प्रतिष्ठा से दूर रहो ....
कामनी वामा रमणी के रूप में
बिखेरो हमारे लिए लटें अपनी
मध्य रात्री में...अल्ल-सुबह की धूप में ...!
तुम हमारे लिए केवल सौन्दर्य - सृजन करो .....
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तुम काम और काम के लिए हों
तुम मेरी तृप्ति और मेरे मान के लिए हों.....!
तुम धर्म की ध्वजा हाथ में मत उठाओ
हमको अयोग्य मत ठहराओ.....!
तुम् वस्तु थीं वस्तु हों और वस्तु ही रहोगी .....!!
रमणी सुकोमल शैया पर सोने वाली मठों में रहोगी.......?
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मैं आगे चलूँगा सदा तुम केवल मेरा अनुगमन करो ....!
मेरी अंक शयना मेरे स्वपन लिए सेज पर प्रतीक्षा रत रहो !
मेरे वंश का सृजन करो मेरा नमन करो

http://www.screenindia.com/fullstory.php?content_id=18213

bhaas Joshi is happy that he’s not become the Voice Of India. “I wouldn’t have got the opportunity to host Chhote Ustaad, if I had won the contest,” he says candidly. It’s a different thing that Abhaas himself is still chhota at 17 years and studying in class XII. Abhaas who hails from Jabalpur was tipped as one of the favourites to win Star Voice.. but got eliminated early on in the series. He was back as a wild card entry but couldn’t stay on till the end since he didn’t get enough votes. He, however, has decided to stay back in Mumbai now. “My father will get a transfer in the next two months,” he informs. What about his studies? “I will have to take a drop this year,” he says simply. As an anchor, Abhaas hopes to impress composers and kickstart his singing career “just like Sonu Niigaam and Shaan who got a fillip after hosting musical shows”. He’s already taken tips from Shaan as a host but plans to capitalise on his naughty and mischevious image. Doesn’t he feel threatened by the young talent he will be hosting. “No. I know they are great but I am also working hard and concentrating on my music,” says the youngster who’s already recorded a song with Aadesh Shrivastav for an untitled film, besides singing a title track for a new Star Plus serial.Chhote Ustaad, a la Little Champs of Zee has Pritam Chakraborty, Kunal Ganjawalla and Shreya Ghoshal as its judges.

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