Tuesday, November 29, 2011

आप की सद भावनाओं की बदौलत शिखर समतल और सब कुछ नापता हूं

आप की सद भावनाओं की बदौलत 
शिखर समतल और सब कुछ नापता हूं
आपने ही दी है मुझको  दिव्य-दृष्टि
राह की अंगड़ाईयों को मैं भांपता हूं.
शोक जब जब घना छाया पंथ तब तब  नया पाया
वेदना ने सर उठाया, तभी मैने गीत एक गीत गाया
बसे आके आस्तीन में मेरे कितने उन सभी को जानता पहचानता हूं..!!

जारी........

Thursday, March 10, 2011

Singer of Baware Faqeera .... Slideshow

Singer of Baware Faqeera .... Slideshow: "TripAdvisor™ TripWow ★ Singer of Baware Faqeera .... Slideshow ★ to Jabalpur by Girish Mukul. Stunning free travel slideshows on TripAdvisor"

Monday, December 27, 2010

लिमटि खरे,समीर लाल स्वर्गीय हीरा लाल गुप्त स्मृति समारोह में सव्यसाची अलंकरण से विभूषित हुए

बवाल की पोस्ट : सम्मान समारोह, जबलपुर,और संदेशा पर संजू बाबा की पोस्ट  में विस्तार से जानकारी के अतिरिक्त आज़ इस समाचार के अलावा विस्तृत रपट शीघ्र देता हूं मिसफ़िट पर इस आलेख के साथ

किसलय जी की पोस्टपर प्रकाशित सामग्री ध्यान देने योग्य है:- 
इंसान पैदा होता है. उम्र के साथ वह अपनी एक जीवन शैली अपना कर निकल पड़ता है अपने जीवन पथ पर वय के पंख लगा कर. समय, परिवेश, परिस्थितियाँ, कर्म और योग-संयोग उसे अच्छे-बुरे अवसर प्रदान करता है. इंसान बुद्धि और ज्ञान प्राप्त कर लेता है परन्तु विवेक उसे उसके गंतव्य तक पहुँचाने में सदैव मददगार रहा है. विवेक आपको आपकी योग्यता का आईना भी दिखाता है और क्षमता भी. विवेक से लिया गया निर्णय अधिकांशतः सफलता दिलाता है. सफलता के मायने भी वक्त के साथ बदलते रहते हैं अथवा हम ही तय कर लेते हैं अपनी लाभ-हानि के मायने. कोई रिश्तों को महत्त्व देता है कोई पैसों को या फिर कोई सिद्धांतों को. समाज में यही सारे घटक समयानुसार प्रभाव डालते हैं. समाज का यही नजरिया अपने वर्तमान में किसी को अर्श और किसी को फर्श पर बैठाता है किन्तु एक विवेकशील और चिंतन शील व्यक्ति इन सारी चीजों की परवाह किये बिना जीवन की युद्ध-स्थली में अपना अस्तित्व और वर्चस्व बनाए रखता है. शायद एक निडर और कर्मठ इंसान की यही पहचान है. समाज में इंसान यदि कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी एवं मानवीय दायित्वों का स्मरण भी रखता है तो आज के युग में यह भी बड़ी बात है. आज जब वक्त की रफ़्तार कई गुना बढ़ गयी है, रिश्तों की अहमियत खो गयी है, यहाँ तक कि शील-संकोच-आदर गए वक्त की बातें बन गयी हैं, ऐसे में यदि कहीं कोई उजली किरण दिखाई दे तो मन को शान्ति और भरोसा होता है कि आज भी वे लोग हैं जिन्हें समाज की चिंता है. बस जरूरत है उस किरण को पुंज में बदलने की और पुंज को प्रकाश स्रोत में बदलने की. आगे (यहां से)

Monday, November 29, 2010

विकलांगता : मशीनरी और समाज मिशन मोड में काम करे

मध्य-प्रदेश  में विकलांगता के परिपेक्ष्य में सचिन कुमार जैन नेमीडिय फ़ार राईट में  लिखे शोध परक आलेख में आलेख में प्रदेश की स्थिति एकदम स्पष्ट कर दी है उसी को आधार बना कर मैं एक आम नागरिक की हैसियत एवम स्वयं विकलांगता से  प्रभावित व्यक्ति के रूप अंतरआत्मा की आवाज़ पर यह आलेख  स्वर्णिम मध्य-प्रदेश की की परिकल्पना को दिशा देने के उद्येश्य से लिख रहा हूं जिसका आशय कदापि अन्यथा न लिया जावे.
विकलांगता 
विकलांगता वास्तव में एक प्रक्रिया से उत्पन्न हुई स्थिति है जिसको सामाजिक धारणायें व्यापक और भयावह रूप प्रदान करती हैं। इसकी अवधारणायें समाज पर निर्भर करती है क्योंकि इनका सीधा सम्बन्ध सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं से होता है। इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन अलग-अलग स्तरों पर परिभाषित करता है :-
1. अंग क्षति (Impairment) मानसिक, शारीरिक या दैहिक संरचना में किसी भी अंग का भंग, असामान्यहोना, जिसके कारण उसकी कार्यप्रक्रिया में कमी आती हो, वह अंग क्षति से जुड़ी अशक्तता होती है।
2. अशक्तता (Disability) अंग क्षति का उस स्थिति में होना जब प्रभावित व्यक्ति किसी भी काम को सामान्य प्रक्रिया में सम्पन्न न कर सके। यहां सामान्य प्रक्रिया उसे माना जाता है जिसे सामान्य व्यक्ति स्वीकार्य व्यवस्था में किसी काम को प्रक्रिया के साथ पूरा करता है।
3. असक्षमता (Handicap)  यह अंग क्षति और अशक्तता के परिणाम स्वरूप किसी व्यक्ति के लिये उत्पन्न हुई दुखदायी स्थिति है। इसके कारण व्यक्ति समाज में अपनी भूमिका और दायित्वों का निर्वहन (आयु, लिंग, आर्थिक, सामाजिक और सास्कृतिक कारकों के फलस्वरूप) कर पाने में असक्षम हो जाता है।
विकलांग व्यक्तियों को समान अवसर देने, उनके अधिकारों के संरक्षण और सहभागिता के लिये 1995 में बने अधिनियम के अनुसार जो व्यक्ति 40 फीसदी या उससे अधिक विकलांग है उसे चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा प्रमाणित किया जायेगा। इसमें दृष्टिहीनता, दृष्टिबाध्यता, श्रवण क्षमता में कमी, गति विषयन बाध्यता, है। नेशनल ट्रस्ट एक्ट, 1999 में आस्टिन, सेलेब्रल पल्सी और बहु-विकलांगता (जैसे मानसिक रोग के साथ अंधत्व) को भी इसमें शामिल कर लिया गया। 
             पोर्टल पर प्रकाशित आलेख की इस  परिभाषा से सहमत हूं  चिकित्सकीय परिभाषा भी इसी के इर्द-गिर्द है.श्री जैन के आलेख में मध्य-प्रदेश की स्थिति के सम्बंध में आंकड़े देखिये :- 
मध्यप्रदेश की स्थिति
मध्यप्रदेश सरकार द्वारा कराये गये विशेश सर्वेक्षण से समाज में विकलांगता के शिकार व्यक्तियों की स्थिति का एक व्यापक चित्र उभरकर आता है। मध्यप्रदेश में कुल 1131405 व्यक्ति किसी न किसी किस्म की विकलांगता के शिकार हैं। इसका मतलब यह है कि ये लोग सरकार द्वारा तय विकलांगता की परिभाषा के अन्तर्गत आते हैं। प्रदेश की इस जनसंख्या का कुछ अलग-अलग बिन्दुओं के आधार पर विश्लेषण किया जा सकता है।
  1. • प्रदेश में 44 फीसदी विकलांग व्यक्ति यानि 412404 व्यक्ति बेरोजगार हैं।
  2. • 287052 व्यक्ति दैनिक रूप से आय अर्जित करके जीवन यापन करते हैं और 281670 अपना खुद का काम करते हैं।
  3. • 1000 रूपये प्रति माह से कम कमाने वाले व्यक्तियों की संख्या 505472 है जबकि 5000 से ज्यादा आय अर्जित करने वाले की संख्या तीन प्रतिशत के आसपास है। सरकारी क्षेत्र में केवल 15955 लोग काम करते हैं।
                              राज्य सरकार और केंद्र सरकार द्वारा उपलब्ध कार्यक्रमों में विकलांगता के संदर्भ में किये जा रहे कार्यों में अधिक पार्दर्शिता और इस वर्ग के लिये कार्य-कर रही चेतना का अभाव समग्र रूप से देखा जा रहा है इसका आशय यह नहीं है कि योजनाएं एवम कार्यक्रम नहीं हैं आशय यह कि क्रियांवयन को सवेदित रूप से देखे जाने की ज़रूरत है जिसके लिये  एक "एकीकृत-सूक्ष्म-कार्ययोजना की  (कार्यक्रम-क्रियांवयन हेतु )" ज़रूरत है.जिस पर राज्य-सरकार का ध्यान जाना अब महति आवश्यक है.
"सामाजिक और तंत्र का नज़रिया"
राज्य सरकार में नियुक्त होने के लिये जब मैं लिखित परीक्षा उत्तीर्ण कर साक्षात्कार के लिये गया तब यही सवाल बार बार किये जा रहे थे कि :- कैसे करोगे काम....? एक अत्यधिक पढ़ा-लिखा तबका जब इस तरह की दुष्चिंता से ग्रस्त है तो आप अंदाज़ा लगा सकतें हैं कि कम पढ़ी-लिखी ग्रामीण आबादी क्या सोच और कह सकती है..? इसी तरह पदोन्नत होकर जब नवपद्स्थापना स्थान पर गया तो वहां भी कुछ ऐसे सवालों से रू-ब-रू होना पड़ा.  यानी सामाजिक सोच की दिशा सदा ही शारीरिक कमियों के प्रति नकारात्मक ही रही. मेरे एक अधिकारी-मित्र का कथन तो यहां तक था कि:-”कहां फ़ंस गए, बेहतर होता कि तुम किसी टीचिंग जाब में जाते..?
              अपाहिजों को  अच्छे लगते जो मुझसे समानता का व्यवहार करतें हैं. किंतु जो थोड़ा सा भी नकार्त्मक सोचते उनके चिंतन पर गहरी पीडा होना स्वाभाविक है. अपाहिज़ व्यक्तियों के प्रति सामाजिक धारणा को समझने के लिये उपरोक्त उदाहरण पर्याप्त हैं. यद्यपि प्रोजेक्ट इंटीग्रेटेड एजुकेशन फॉर द डिसएबल्ड एक उत्तम कोशिश है ताक़ि नज़रिया बदले समाज का ! किंतु इतना काफ़ी नहीं है. मुझे अच्छी तरह से याद है पंचायत एवम समाज कल्याण विभाग में एक श्री अग्रवाल जी हुआ करते थे जिनके दौनों हाथ के पंजे नहीं थे उनने  अपने आप विकल्प की तलाश की और वे ठूंठ हाथों में रबर बैण्ड के सहारे कलम फ़ंसा कर मोतियों समान अक्षरों में लिख लिया करते थे, हमें अपनी योग्यता अक्सर पल पल सिद्ध करनी होती है जबकि सबलांग स्वयमेव सक्षम माने जाते हैं. भले ही विकलांग व्यक्ति अधिक आउट-पुट दे.
अक्सर विकलांग-व्यक्ति को अपने आप को समाज ओर व्यवस्था के समक्ष प्रतिबध्दता प्रदर्शित करने के लिये विकल्पों पर निर्भर करना होता है एक भी विकल्प की अनुउपलब्धता विकलांग-व्यक्ति को हीनता बोध कराती है. कार्य-सफ़लता पूर्वक पूर्ण करने पर भी उठते सवालों से भी भावनाएं आहत होतीं हैं. जिनका गहरा एवं निगेटिव मनोवैज्ञानिक प्रभाव पढ़्ता है और यही प्रभाव मन के आक्रोश को उकसाता है अर्थात प्रोवोग करता है. क्या समाज कुछ ऐसा सकारात्मक चिंतन कर रहा है मुझे नहीं लगता कि ऐसी कोई स्थिति अभी समाज की चेतना में है. या इसे बढ़ावा दिया जा रहा है. . वर्तमान समय से बेहतर था वैदिक और प्राचीन पश्चिम क्रमश: अष्टावक्र और फ़्रैंकलिन डी रूज़वेल्ट को स्वीकारा गया 
   
विकलांग व्यक्तियों के लिए राहत आयकर रियायत
विकलांग व्यक्तियों के लिए यात्रा रियायतें
विकलांग व्यक्तियों के अधिकार
अधिकार और रियायतें
निःशक्तता अधिनियम, 1995 के अधीन विकलांग व्यक्तियों के अधिकार ।
राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999 के अधीन विकलांग व्यक्तियों के अधिकार ।
भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम, 1992 के विकलांग व्यक्तियों के अधिकार ।
मानसिक रुप से ग्रस्त विकलांग व्यक्तियों के अधिकार ।
यात्रा (विकलांग व्यक्तियों के लिए यात्रा-रियायत)
वाहन भत्ता
आयकरमेंछूट
विकलांगव्यक्तियोंके लिएनौकरियोंमेंआरक्षणऔरअन्यसुविधाएं
विकलांग व्यक्तियों के लिए वित्तीय सहायता
विकलांग व्यक्तियों के पुनर्वास के लिए केंद्रीय सरकार की स्कीम

 विकलांगता के शिकार लोगों के लिये सरकारों से अपेक्षा से पेश्तर समाज को समझ दारी पूर्ण चिंतन करना ज़रूरी है. वरना इस दिवस और फ़ोटो छपाऊ  समाज सेवा का मंचन तुरंत बंद कर देना चाहिये

Saturday, November 27, 2010

हरिवंशराय बच्चन जी के जन्म दिन पर

जबलपुर प्रवास के दौरान शशिन जी के कैमरे में कैद फ़ोटोज़  
हरिवंशराय बच्चन जन्म: 27 नवंबर1907
मेरे न हमारे  प्रिय कवि बच्चन जी का आज जन्म दिन है . कविता कोश ने उन पर विस्तृत सामग्री जमा कर रखी है. किंतु हिंदी विकी पर हम अधिक जानकारीयों न डाल सके. आज उनकी ही एक कविता यहां प्रस्तुत करते हुए हर्षित हूं
एकांत-संगीत
तट पर है तरुवर एकाकी,
नौका है, सागर में,
अंतरिक्ष में खग एकाकी,
तारा है, अंबर में,
भू पर वन, वारिधि पर बेड़े,
नभ में उडु खग मेला,
         नर नारी से भरे जगत में
                                                                                              कवि का हृदय अकेला!
सतरंगिनी / हरिवंशराय बच्चन (1945) हलाहल / हरिवंशराय बच्चन (1946) बंगाल का काल / हरिवंशराय बच्चन (1946) खादी के फूल / हरिवंशराय बच्चन (1948) सूत की माला / हरिवंशराय बच्चन (1948) मिलन यामिनी / हरिवंशराय बच्चन (1950) प्रणय पत्रिका / हरिवंशराय बच्चन (1955) धार के इधर उधर / हरिवंशराय बच्चन (1957) आरती और अंगारे / हरिवंशराय बच्चन (1958) बुद्ध और नाचघर / हरिवंशराय बच्चन (1958) त्रिभंगिमा / हरिवंशराय बच्चन (1961) चार खेमे चौंसठ खूंटे / हरिवंशराय बच्चन (1962) १९६२-१९६३ की रचनाएँ / हरविंशराय बच्‍चन दो चट्टानें / हरिवंशराय बच्चन (1965) बहुत दिन बीते / हरिवंशराय बच्चन (1967) कटती प्रतिमाओं की आवाज / हरिवंशराय बच्चन (1968) उभरते प्रतिमानों के रूप / हरिवंशराय बच्चन (1969) जाल समेटा / हरिवंशराय बच्चन (1973) 

Wednesday, November 24, 2010

ब्रेकिंग-न्यूज़ जीरो हास्पिटल से देर शाम डिस्चार्ज : रोहतक ब्लागर मीट की स्वादिस्ट खीर बिखरी

सुर्खियॊं मे रहने वाला शरारती बालक ज़िंदगी को जीत के आज़ वापस आ गया. मौत जिसे छूकर निकल गई हो उसे हमारा स्नेह शतायु होने का आशीर्वाद है. आते  ही फ़ोन दागा और लगा दुनिया ज़हान की याद करने... लग गया दुनियां जहान की चिंता में. ज़ीरो है जिसकी खोज भारत में ही हुई है ससुरे के बिना कोई काम नहीं चलता. आगे लगा के एक बिंदी धर दो इकनी एक दूनी दो के अर्थ बदल जाते हैं . अंक के बाद में जित्ती बढ़ाओ उत्ता (उतना )
असर दिखाता है.. ये ज़ीरो यानी महफ़ूज़ जो नाम से महफ़ूज़ है तो रहेगा भी महफ़ूज़ ही न? स्वाथ्य-लाभ की मंगल कामना के साथ.


         यह पोस्ट किसी भी स्थिति में हैप्पी ब्लागिंग का आव्हान है न कि विवादों को हवा देने के लिए मूल पोस्ट में लेखकीय भावना को समझने का सन्देश है न कि विवाद को आगे बढ़ाना . ब्लॉगर का या सर्वाधिकार है कि वह पोस्ट में आई टिप्पणियों को स्वीकारे अथवा अस्वीकृत करे. या पोस्ट/ब्लॉग पर टिप्पणी ही ..न आने दे स्पष्ट रूप से मुझे यकीन है कि भाई ललित शर्मा और अन्य ब्लागर जो उस वक़्त मौज़ूद थे स्थिति साफ़ कर देगें .
रोहतक में सुबह का झगड़ा रात का पानी वाली कहावत के चरितार्थ होने की वज़ह से खीर कुछ खट्टी अवश्य हुई किंतु जो पहले खा चुके थे वे गूंगे की तरह  मुंह में गुड़ का स्वाद बड़े मजे से ले रहे हैं. पता नहीं क्या हुआ कि शब्दों के प्रयोग का बखेड़ा खीर के गंज से खीर बिखेर गया. बस नज़रिये की बात है.  वैसे शब्दों के साथ खिलवाड़ का हक़ तो किसी को भी नहीं किंतु मूल पोस्ट में ऐसा कुछ प्रतीत तो नहीं हुआ. फ़िर जिस भी  नज़रिये से बाद में जो भी कहा सुनी हुई उससे मीट रूपी खीर न केवल खट्टी हुई वरन बिखरे भी दी गई. ऐसा ब्लागर्स मीट में हुआ.   पंडित जी के मानस पर हुई हलचल से मेरा बायां हाथ कांप रहा था. लगा कि शायद कोई लफ़ड़ा पकड़ा गुरुदेव ने. जो ब्लाग जगत के वास्ते सुखद नहीं है. पूरा दिन सर्किट-हाउस लिखने के बाद देर रात लेपू महाराज़ से मिला तो अंदेशा सच निकला. बेहतर होगा कि हम सौजन्यता से इस विवाद का पटाक्षेप कर दें. रहा पुरुषवादी लेखन का सवाल तो हर पुरुष ब्लागर किसी माता का बेटा है, किसी नारी का पति है, किसी बिटिया का पिता है किसी बहू का ससुर बेशक अगर कोई नारी जगत के खिलाफ़ अश्लीलता उगले उसका सामूहिक विरोध  करने में हम सभी साथ होंगे पर य देखना ज़रूरी है कि क्या वास्तव में मूल पोस्ट में लेखक के मनोभाव क्या थे. सुरेश भैया और अदा जी ने जब नज़रिया रखा तो दृश्य एकदम बदला बदला प्रतीत हुआ. खैर जो भी हो रहा है उसे "अच्छा" नहीं कहा जा सकता. अब बारी है ललित भाई की कि वे खुले तौर पर "रचना" शब्द के प्रयोग पर अपनी बात रहें. रचना शब्द का प्रयोग अगर आपने आदरणीया रचना जी के लिये किया तो आप को पोस्ट विलोपित करनी ही होगी इसके लिये आवश्यक है कि आप जैसे ही यात्रा के दौरान या घर पहुंच कर जितना भी जल्द हो सके स्थिति स्पष्ट कीजिये उम्मीद है मेरा आग्रह आप अस्वीकृत न करेंगें. वैसे मुझे भरोसा है कि आप ने सदभावना से आलेखन किया होगा. और यह भी सच है कि  भौगोलिक-दूरी से सही स्थिति का आंअकल सम्भव नहीं है. फ़िर तो और भी ज़रूरी है कि आप स्वयम स्थिति स्पष्ट कर दें. यहां सवाल हिंदी ब्लागिंग का न होकर समूची महिलाओं के सम्मान का बन पड़ा है.  
  मां शारदा हर ब्लागर को सुविषय एवम शब्द चयन का सामर्थ्य दे