Monday, April 28, 2014

पिरो गया किमाच कौन मोगरे के हार में !!


अदेह के सदेह प्रश्न कौन गढ़ रहा कहो
गढ़ के दोष मेरे सर कौन मढ़ रहा कहो ?
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बाग में बहार में, ,
सावनी फुहार में !
पिरो गया किमाच कौन
मोगरे के हार में !!
पग तले दबा मुझे कौन बढ़ गया कहो...?
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एक गीत आस का
एक नव प्रयास सा
गीत था अगीत था !
या कोई कयास था...?
गीत पे अगीत का वो दोष मढ़ गया कहो...?
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तिमिर में खूब  रो लिये
जला सके न तुम  दिये !
दीन हीन ज़िंदगी ने
हौसले  डुबो दिये !!
बेवज़ह के शोक गीत कौन गढ़ रहा कहो... ?
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2 comments:

Satish Saxena said...

अफ़सोस, गिरीश की कवितायें कभी पढ़ी ही नहीं , प्रभावशाली रचना , बधाई भाई !

Kavita Rawat said...

आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाये