Showing posts with label फाकिर. Show all posts
Showing posts with label फाकिर. Show all posts

Sunday, February 24, 2008

किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी !!

Feb 21, 05:05 pm फिरोजपुर [जागरण संवाददाता]। ंवो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी.. हे राम. व आदमी आदमी को क्या देगा जो भी देगा खुदा देगा.. जैसी कालजयी गजलें लिखने वाले मशहूर शायर सुदर्शन फाकिर सोमवार को इस दुनिया से रुखसत हो लिए। अफसोस कि पंजाब को एक अलग पहचान देने वाले इस शख्स को पंजाबियों और पंजाब ने नहीं पहचाना। वर्ष 1937 में फिरोजपुर के गुरुहरसहाय कस्बे के रत्ताखेड़ा गांव में डाक्टर बिहारी लाल कामरा के यहां जन्म लेने वाले सुदर्शन फाकिर के परिवार में दो अन्य भाई भी थे। बड़े भाई का देहांत हो चुका है। जालंधर में रहने वाले छोटे भाई विनोद कामरा के यहां फाकिर साहब ने जिंदगी के आखिरी लम्हे बिताए। फाकिर साहब के अजीज मित्रों कहना है कि उनकी याददाश्त काफी तेज थी। जिस शख्स से वह मिल लेते थे, उसे दोबारा अपना नाम नहीं बताना पड़ता था। यह अलग बात है कि फाकिर साहब को उनके घर का पता कभी याद नहीं रहा। वर्ष 1970 से पहले जालंधर में आल इंडिया रेडियो में नौकरी करने वाले फाकिर साहब को वहां मन नहीं लगा। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और मुंबई चले आए। 2005 में वह मुंबई से वापस आकर जालंधर में अपने छोटे भाई के यहां रहने लगे। सत्तर के करीब गजल लिखने वाले फाकिर की प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन दिनों बेगम अख्तर सिर्फ पाकिस्तान के शायरों की गजल ही गाया करती थीं। मगर, फाकिर साहब पहले भारतीय शायर हैं, जिनकी लिखी गजल बेगम अख्तर ने बुलाकर ली और अपनी आवाज दी। वह मशहूर गजल थी 'इश्क में गैरते जज्बात नेरोने न दिया..'। बाद में चित्रा सिंह ने भी इसे गाया था। मोहम्मद रफी ने उनकी गजल 'फलसफे इश्क में पेश आए हैं सवालों की तरह..' गाकर दुनिया में धूम मचा दी। इस नज्म ने फाकिर को नई पहचान दी। जब गजल गायक जगजीत सिंह ने उनके द्वारा लिखी गजल 'वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी.' गाया उसके बाद फाकिर केनाम का डंका दुनिया में ऐसा गूंजा कि उसकी खनक आज भी सुनाई देती है। उनके द्वारा लिखित गजल 'जिंदगी मेरे घर आना..' गाकर भूपिंदर सिंह ने फिल्म फेयर अवार्ड जीता। वहीं गुलाम अली ने 'कैसे लिखोगे मोहब्बत की किताब तुम तो करने लगे पल-पल का हिसाब..' गाकर गजलों के इस सम्राट को सलाम किया था। फाकिर का अंतिम शेर जो दुनिया के सामने नहीं आ सका, वह था 'लाश मासूम की हो या कि कातिल की, जनाब हमने अफसोस किया है..'। वर्ष 1982 में गजल की एक कैसेट रिलीज की गई थी, उसमें मीरा व कबीर के सात भजन थे और आठवां भजन फाकिर साहब ने लिखा था। वहीं फाकिर साहिब का एक गीत 'आखिर तुम्हें आना है जरा देर लगेगी..' भी काफी पसंद किया गया था। इसका बालीवुड फिल्म यलगार के लिए इस्तेमाल किया गया था। http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_4198016/ पर सम्पूर्ण समाचार उपलब्ध है। हिंद-युग्म के राजीव रंजन,शैलेश जी , फाकिर साहब के जीवन और उनको सूचना संसार से उपेक्षित रहने को लेकर दु:खी हें जिन्दगी से बात करतीं गजल,जिन्दगी की बात करती ग़ज़ल, और जब सुदर्शन जी की शायरी ,बेगम अख्तर की आवाज़ के रथ पे सवार लगती कोई साम्राज्ञी की शोभा यात्रा हो, नए दौर में जगजीत सिंह के स्वरों के जारी हमारे कानों से सीधे दिल मी उतर वहीं बस गयी लगती फाकिर साहब की गज़लें. यूनुस खान ने बताया की सुदर्शन फाकिर इंटरव्यू, आत्म प्रकाशन जैसी बातों से दूर ही रहतें थे . एक गंभीर शायर जो आम बोल चाल के शब्दों को ग़ज़ल में आसानी से बदल देने वाले सुदर्शन फाकिर नहीं रहे वो बात कैसे लाते थे सादगी अपने कलाम में सुदर्शन फाकिर इस बात को समझने के लिए अब केवल हमको निर्भर रहना होगा उनकी रचनाओं पर किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी मुझ को एहसास दिला दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी मेरे रुकने से मेरी साँसे भी रुक जायेंगी फ़ासले और बड़ा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी ज़हर पीने की तो आदत थी ज़मानेवालो अब कोई और दवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी चलती राहों में यूँ ही आँख लगी है 'फ़ाकिर' भीड़ लोगों की हटा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी v सुदर्शन फ़ाकिर की रचनाएँ आदमी आदमी को क्या देगा आज के दौर में ऐ दोस्त आज तुम से बिछड़ रहा हूँ अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें अहल-ए-उल्फ़त के हवालों पे चराग़-ओ-आफ़ताब ग़ुम ढल गया आफ़ताब ऐ साक़ी दिल के दीवार-ओ-दर पे क्या देखा दुनिया से वफ़ा करके फ़ल्सफ़े इश्क़ में पेश आये ग़म बढ़े आते हैं हम तो यूँ अपनी ज़िन्दगी से मिले इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात जब भी तन्हाई से घबरा के जिस मोड़ पर किये थे किसी रंजिश को हवा दो कुछ तो दुनिया की इनायात मेरे दुख की कोई दवा न करो मेरी ज़ुबाँ से मेरी दास्ताँ पत्थर के ख़ुदा पत्थर के सनम फिर आज मुझे तुम को सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं शायद मैं ज़िन्दगी की सहर शैख़ जी थोड़ी सी पीकर आइये उल्फ़त का जब किसी ने उस मोड़ से शुरू करें ये दौलत भी ले लो ये शीशे ये सपने ज़ख़्म जो आप की इनायत है ज़िन्दगी तुझ को जिया है वो काग़ज़ की कश्ती दिल तोड़ दिया पत्थर के ख़ुदा गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" 9424358167 girishbillore@gmail.com

other link's http://www.hindimedia.in/content/blogsection/6/66/ ,http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_4198016/

Followers