Sunday, April 27, 2008

बावरे-फकीरा "BAWARE FAQEERA": बावरे फकीरा मेक

बावरे फकीरा मेक

बावरे फकीरा मेक

आशीष सक्सेना की मेहनत ,श्रेयस के संकल्प से

बावरे फकीरा पूरा हुआ

मुझे यकीन था कि आभास के सुर सह गायिका संदीपा पारे के सुरों का

साथ पाकर इस एलबम को जो ऊंचाई देंगे उसके लिए "बाबा के कृपा "

कहना ही शेष होगा,और हम कह भी क्या सकते हैं......!!

मुझे चिंता नहीं है आपका प्यार भी तो है हमारी साथ

गिरीश बिल्लोरे

Thursday, April 24, 2008

आभास को शोकाकुल है

आभास जोशी की नानी का देहावसान २३/०४/०८ को प्रात: ६:०० बजे भोपाल में हो गया, संवेदनाएं

प्रतिभा और बाज़ार

[01] प्रतिभा और बाज़ार उसकी सफलता की कहानी में केवल उसका टेलेंट ही था...? ये अर्ध सत्य इस कारण भी क्योंकि बाज़ारवाद में ये सब कुछ होता है तरक्की और विकास के शब्द सिर्फ़ व्यवसायिकता के पन्नों पे दिखाई देतें हैं । रोशनी को सलाम करता ये समय तिमिर को नहीं पूछ रहा होता है। मेरी, आपकी, यानी हम सबकी नज़र के इर्द गिर्द हजारों हज़ार प्रतिभाएं बेदम दिखाईं देतीं है ,किंतु केवल वो ही सफल होती है जो ग्लैमरस हो.यानी व्यवसायिकता के लिए मिसफिट न हो । माँ-बाप की तस्वीरें घर के बैठक खानों से लापता है,तो पूजा घर में होगी...? नहीं घर के नक्शे में पूजा घर के लायक जगह थी ही नहीं....सो बन नहीं पाया पूजा घर । जैसे ही मेरी नज़र गयी दीवार पर इक मँहगी पेंटिंग जो न तो भाई साहब के पिताजी की थी और न ही माँ की तस्वीर थी वो, इसका अर्थ ये नहीं की उनके मन में माँ - बाप के लिए ज़गह नहीं है बात दरअसल ये है कि हमारी इन महाशय पर व्यावसायिकता इस कदर हावी हुई है कि वो सब कुछ भूल गए बच्चो से भी तो कम ही मिल पातें हैं वे तो दिवंगतों को याद रखना कैसे सम्भव होगा । विष्यान्तर होने के लिए माफी चाहता हूँ ,वास्तव में जिन श्रीमान की मैं चर्चा कर रहा हूँ वे बेहतरीन चित्रकार थे, तूलिकाएं,रंग,केनवस् उनके इशारे पे चलते थे,अब ..... वो प्रतिभा गुमसुम सी है, केनवस् कलम रंग को छुए बरसों बीत गए। केवल व्यापारिक-दक्षता ही उपयोगी साबित हुई उनके जीवन के लिए । पेंसिल से चित्रकारी करते लोगों की तारीफ करनी होगी,जो व्यावसायिकता के दौर में आज भी प्रतिभा को ज़िंदा रखतें हैं । ब्लॉगर के रूप सही,कला को ज़िंदा रखना ही होगा अस भी बस भी....! अखबार,पत्रिकाएँ,विज्ञापनजीवी संचार माध्यमों के माथे दोष मढ़्ना ग़लत होगा समय ही ऐसा है कि कला साहित्य के पन्ने कम होते जा रहे हैं।

Saturday, March 29, 2008

*KHAZANA*: "लाडली-लक्ष्मी"से बालिकाओं के लिए सोच बदली है...!!"#links#links#links#links#links#links

*KHAZANA*: "लाडली-लक्ष्मी"से बालिकाओं के लिए सोच बदली है..!

आभास आज 18 साल का हों गया है

आभास को जन्म दिन की हार्दिक बधाइयां " भावों की सलाई लेकर हम शब्द बुने तुम सुर देना *********************** जीवन के सफर में मैंने भी कुछ सपन बुनें तुमको लेकर . कुछ स्वपन मेरे थे मुक्त गीत कुछ सपनों के तीखे तेवर ..? मन की पीडा जब गीत बने श्रेयस होगा तुम सुर देना ...!! ************************* आभास मुझे था जीवन में कुछ ऐसा हम कर जाएंगे देंगें इक मुट्ठी दान कभी भर-भर के झोली पाएँगें ..! जब मन इतराए बादल सा तुम सावन का रिम झिम सुर देना !! ************************** " आभास को जन्म दिन की हार्दिक बधाइयां " गिरीश चचा,सतीश हरीश,अंकुर,सोनू,श्रद्धा, चिन्मय,आस्था,अनुभा,शिवानी, एवं काशीनाथ बिल्लोरे एवं समस्त बिल्लोरे परिवार जबलपुर, के साथ बावरे फकीरा टीम,सुदर्शन परिवार,मनीष शर्मा,माधव सिंह यादव,

Sunday, March 23, 2008

उपयोग करके फैंकिए मत

आस का किसी ने जगाया था । उसने जीवन हर मोड़ पे नए नवेले मीठे-मीठे , खट्टे-खट्टे अनुभव की पोटली लेकर दिखाई दिया । वो सच्चा आदमी जब किसी का साथ देता तब डिफैन्सिव नहीं होता उसे अपना लक्ष्य स्पस्ट रूप से दिखाई दे रहा था। चलिए उस आदमी को नाम दे देतें हैं , उसका नाम आलू चमन था......अपना खून पसीना रामलाल को सफल करने में गिराता रहा । रामलाल अपनी जिन्दगी के साधारण स्तर से आजिज़ आ गया था , हर और आंशिक सफलता और क्विंटल भर असफलताएं लिए ख़ाक छानता । आलू चमन की मदद से आगे और आगे बढ़ता अब भूल गया लगता है रामलाल । ऐसे राम लालों की कमी कतई नहीं । इतने मकसद परस्तो,डिफेंसिव-खिलाडियों में कहीं आप तो नहीं यदि आप हैं तो आज कोशिश कीजिए उस मोटी कैंचुली से बाहर निकलनें की । शायद व्यावसायिकता के दौर से ,इंसानियत को बचा लाने में सफल होगें हम और आप

Sunday, March 16, 2008

होली तो ससुराल

होली तो ससुराल की बाक़ी सब बेनूर सरहज मिश्री की डली,साला पिंड खजूर साला पिंड-खजूर,ससुर जी ऐंचकताने साली के अंदाज़ फोन पे लगे लुभाने कहें मुकुल कवि होली पे जनकपुर जाओ जीवन में इक बार,स्वर्ग का तुम सुख पाओ..!! ######### होली तो ससुराल की बाक़ी सब बेनूर न्योता पा हम पहुंच गए मन संग लंगूर, मन में संग लंगूर,लख साली की उमरिया मन में उठे विचार,संग लें नयी बंदरिया . कहत मुकुल कविराय नए कानून हैं आए दो होली में झौन्क, सोच जो ऐसी आए ...!! ######### होली तो ससुराल की ,बाक़ी सब बेनूर देवर रस के देवता, जेठ नशे में चूर , जेठ नशे में चूर जेठानी ठुमुक बंदरिया ननदी उम्र छुपाए कहे मोरी बाली उमरिया . कहें मुकुल कवि सास हमारी पहरेदारिन ससुर देव के दूत जे उनकी हैं पनिहारिन..!! ######### सुन प्रिय मन तो बावरा, कछु सोचे कछु गाए, इक-दूजे के रंग में हम-तुम अब रंग जाएं . हम-तुम अब रंग जाएं,फाग में साथ रहेंगे प्रीत रंग में भीग अबीरी फाग कहेंगे ..! कहें मुकुल कविराय होली घर में मनाओ मंहगे हैं त्यौहार इधर-उधर न जाओ !!

आभार

स्पन्दन के लिए बेजी का कैसे आभार करें

नौ महीने गर्भ में आरंभ वात्सल्य ये सभी पोस्ट काबिले सम्मान हैं...

आभार

Thursday, March 6, 2008

महिला दिवस पर एक चिंतन "चिंता नहीं चिंतन की ज़रूरत है"

महिला सशक्तिकरण की चिंता करना और समाज के समग्र विकास में महिलाओं की हिस्सेदारी पर चिंतन करना दो अलग-अलग बिन्दु हैं ऐसा सोचना बिलकुल गलत है । लिंग-भेद भारतीय परिवेश में मध्य-कालीन देन है किन्तु अब तो परिस्थितियाँ बदल रहीं है किन्तु बदलती तासीर में भी महिला वस्तु और अन्य वस्तुओं के विक्रय का साधन बन गयी है. अमूल माचो जैसे विज्ञापन इसके ताज़ा तरीन उदाहरण हैं .क्या विकास के इस फलक पर केवल विज्ञापन ही महिलाओं के लिए एक मात्र ज़गह है...? ऑफिस में सेक्रेटरी,क्लर्क,स्टेनो,स्कूलों में टीचर,बस या इससे आगे भी-"आकाश हैं उनके लिए॥?"हैं तो किन्तु यहाँ सभी को उनकी काबिलियत पे शक होता है .होने का कारण भी है जो औरतैं स्वयम ही प्रदर्शित करतीं हैं जैसे अपने आप को "औरत" घोषित करना यानी प्रिवलेज लेने की तैयारी कि हम महिला हैं अत:...हमको ये हासिल हों हमारा वो हक है , .... जैसा हर समूह करता है।.....बल्कि ये सोच होनी चाहिए कि हम महिलाएं इधर भी सक्षम हैं...उस काम में भी फिट...! यहाँ मेरा सीधा सपाट अर्थ ये है की आप महिला हैं इसका एहसास मत .होने दीजिए ...सामाजिक तौर पे स्वयम को कमजोर मत सिद्ध करिए ... वरन ये कहो की-" विकास में में समान भागीदार हिस्सा हूँ.....!" दरअसल परिवार औरतों को जन्म से औरत होने का आभास कराते हैं घुट्टी के संस्कार सहजता से नहीं जाते ।आगे जाते-जाते ये संस्कार पुख्ता हो जातें हैं।मसला कुल जमा ये है कि महिला के प्रति हमारी सोच को सही दिशा की ज़रूरत है...वो सही दिशा है समग्र विकास के हिस्से के तौर पर महिला और पुरुष को रखने की कोशिश की जाए॥

सुनीता शानू जी.....ने.....महिला दिवस पर एक सामयिक रचना ......ब्लाग पर पोस्ट की है एक क्लिक कीजिए कविता केलिए मै और तुम उनके ब्लोंग पर यहाँ क्लिक करके देखिए "मन पखेरू फ़िर उड़ चला"

Saturday, March 1, 2008

रामकृष्ण गौतम

http://www.koitohoga.blogspot.com/ JABALPUR /ஜபல்பூர் /ಜಬಲ್ಪುರ್ /Jఅబల్పూర్ यानी अपने जबलैपुर या जबल+ई+पुर के रामकृष्ण गौतम का ब्लॉग "Least but not the Last_ _ _! ! !" देखने लायक तो है ही बेहतरीन भी है...... !! बधाइयां

Thursday, February 28, 2008

मध्य-प्रदेश लेखक संघ ने प्रस्ताव आहूत किए

म० प्र० लेखक संघ भोपाल ने अपने परिपत्र में कार्यकारणी की घोषणा करते हुए २००८ के लिए निम्न लिखित सम्मानों के प्रस्ताव आहूत किए हैं:-
  • अक्षर-आदित्य-सम्मान, आयु-सीमा ६० वर्ष,
  • पुष्कर-सम्मान,६० वर्ष तक की आयु सीमा
  • देवकी-नंदन-सम्मान,३५-५० , आयु वर्ग के रचनाकारों के लिए,
  • काशी-बाई-मेहता-सम्मान,किसी भी आयु की महिला लेखिका,के लिए,
  • कस्तूरी देवी चतुर्वेदी,लोक-भाषा-सम्मान,म०प्र० की लोक भाषा, की महिला साहित्यकार को , योग्य प्रस्ताव के अभाव में पुरुष साहित्यकार के नाम पर विचार किया जाएगा ,
  • माणिक वर्मा,व्यंग्य-सम्मान,
  • चंद्रप्रकाश जायसवाल,बाल-साहित्य-सम्मान,
  • पार्वती देवी मेहता अहिन्दी भाषी हिन्दी-साहित्यकार
  • डा० संतोष कुमार तिवारी -समीक्षा सम्मान, ६० वर्ष आयु से अधिक आयु के समीक्षक को , शिथिलाताएं संभावित
  • हरिओम शरण चौबे गीतकार सम्मान,
  • कमला देवी लेखिका सम्मान
  • मालती वसंत सम्मान [द्वि-वार्षिक ] १८ वर्ष आयु वर्ग की युवा लेखिका को
  • सारस्वत-सम्मान,
  • अमित रमेश शर्मा हास्य-व्यंग्य के लिए

प्रस्ताव के लिए म०प्र० के साहित्यकार,जिला एकांशों के पदाधिकारियों से सम्पर्क कर सकते हैं । अथवा निम्न लिखित पतों पर सम्पर्क

कीजिए:-

  1. श्री बटुक-चतुर्वेदी ,१४/८,परी-बाज़ार,शाहाज़हानाबाद, भोपाल,म०प्र०
  2. गिरीश बिल्लोरे मुकुल एकांश अध्यक्ष , जबलपुर ,एकांश,९६९/ए-२,गेट न० ०४, जबलपुर

[ क्रमांक २ से केवल प्रस्ताव हेतु प्रपत्र -प्राप्ति हेतु सम्पर्क कीजिए]

Monday, February 25, 2008

एक ख़त : पूर्णिमा वर्मन जी के नाम

http://abhivyakti-hindi.org/ <= लिंक पर उपलब्ध अभिव्यक्ति-अनुभूति की संपादिका को आज लिखे ख़त को सभी के लिए पोस्ट करना ज़रूरी है.....पूर्णिमा जी सादर अभिवादन आज ही जबलपुर में हिन्दी-साहित्य सम्मेलन जबलपुर जिला इकाई बैठक में आपकी चर्चा हुई। मो। मोइनुद्दीन "अतहर",प्रदीप"शशांक", सनातन बाजपेई जी,एवं श्री राम ठाकुर दादा आदि को प्राप्त सम्मान के लिए उन्हें शुभकामना देने का अवसर भी था , आज अभी-अभी अभिव्यक्ति पर छपी इस सूचना => "ये रचनाएँ मौलिक तथा अप्रकाशित होनी चाहिए। इन्हें किसी भी पत्र-पत्रिका, या वेब साइट अथवा ब्लॉग पर पहले प्रकाशित नहीं होना चाहिए। यदि बाद में यह पता चला कि रचना मौलिक नहीं थी या पहले प्रकाशित हो चुकी थी तो मानदेय की धनराशि का भुगतान रोका जा सकता है। यदि भुगतान कर देने के बाद इनके पूर्व प्रकाशित होने की जानकारी मिलती है तो भविष्य में उस कवि लेखक की रचनाओं का प्रकाशन अभिव्यक्ति व अनुभूति में हमेशा के लिए रोका जा सकता है।" के लिए आपके प्रति कृतज्ञ हूँ , आपकी इस पहल के बाद अन्य वेब-पत्रिकाएँ इसी तरह अलर्ट रहेगीं तो साहित्यिक-चौर्य-कर्म पर प्रतिबन्ध लगेगा। अंतर जाल पर साहित्य को लेकर भी आज बेहद प्रभावी चर्चा हुई बार बार आपका ज़िक्र सुन कर अच्छा लगा . शुभ कामनाओं के साथ गिरीश बिल्लोरे मुकुल प्रति, पूर्णिमा वर्मन, संपादक ,अभी-अनु, प्रतिलिपि:- वेब-पत्रिकाओं के संपादक गण

Sunday, February 24, 2008

बावरे-फकीरा,

किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी !!

Feb 21, 05:05 pm फिरोजपुर [जागरण संवाददाता]। ंवो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी.. हे राम. व आदमी आदमी को क्या देगा जो भी देगा खुदा देगा.. जैसी कालजयी गजलें लिखने वाले मशहूर शायर सुदर्शन फाकिर सोमवार को इस दुनिया से रुखसत हो लिए। अफसोस कि पंजाब को एक अलग पहचान देने वाले इस शख्स को पंजाबियों और पंजाब ने नहीं पहचाना। वर्ष 1937 में फिरोजपुर के गुरुहरसहाय कस्बे के रत्ताखेड़ा गांव में डाक्टर बिहारी लाल कामरा के यहां जन्म लेने वाले सुदर्शन फाकिर के परिवार में दो अन्य भाई भी थे। बड़े भाई का देहांत हो चुका है। जालंधर में रहने वाले छोटे भाई विनोद कामरा के यहां फाकिर साहब ने जिंदगी के आखिरी लम्हे बिताए। फाकिर साहब के अजीज मित्रों कहना है कि उनकी याददाश्त काफी तेज थी। जिस शख्स से वह मिल लेते थे, उसे दोबारा अपना नाम नहीं बताना पड़ता था। यह अलग बात है कि फाकिर साहब को उनके घर का पता कभी याद नहीं रहा। वर्ष 1970 से पहले जालंधर में आल इंडिया रेडियो में नौकरी करने वाले फाकिर साहब को वहां मन नहीं लगा। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और मुंबई चले आए। 2005 में वह मुंबई से वापस आकर जालंधर में अपने छोटे भाई के यहां रहने लगे। सत्तर के करीब गजल लिखने वाले फाकिर की प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन दिनों बेगम अख्तर सिर्फ पाकिस्तान के शायरों की गजल ही गाया करती थीं। मगर, फाकिर साहब पहले भारतीय शायर हैं, जिनकी लिखी गजल बेगम अख्तर ने बुलाकर ली और अपनी आवाज दी। वह मशहूर गजल थी 'इश्क में गैरते जज्बात नेरोने न दिया..'। बाद में चित्रा सिंह ने भी इसे गाया था। मोहम्मद रफी ने उनकी गजल 'फलसफे इश्क में पेश आए हैं सवालों की तरह..' गाकर दुनिया में धूम मचा दी। इस नज्म ने फाकिर को नई पहचान दी। जब गजल गायक जगजीत सिंह ने उनके द्वारा लिखी गजल 'वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी.' गाया उसके बाद फाकिर केनाम का डंका दुनिया में ऐसा गूंजा कि उसकी खनक आज भी सुनाई देती है। उनके द्वारा लिखित गजल 'जिंदगी मेरे घर आना..' गाकर भूपिंदर सिंह ने फिल्म फेयर अवार्ड जीता। वहीं गुलाम अली ने 'कैसे लिखोगे मोहब्बत की किताब तुम तो करने लगे पल-पल का हिसाब..' गाकर गजलों के इस सम्राट को सलाम किया था। फाकिर का अंतिम शेर जो दुनिया के सामने नहीं आ सका, वह था 'लाश मासूम की हो या कि कातिल की, जनाब हमने अफसोस किया है..'। वर्ष 1982 में गजल की एक कैसेट रिलीज की गई थी, उसमें मीरा व कबीर के सात भजन थे और आठवां भजन फाकिर साहब ने लिखा था। वहीं फाकिर साहिब का एक गीत 'आखिर तुम्हें आना है जरा देर लगेगी..' भी काफी पसंद किया गया था। इसका बालीवुड फिल्म यलगार के लिए इस्तेमाल किया गया था। http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_4198016/ पर सम्पूर्ण समाचार उपलब्ध है। हिंद-युग्म के राजीव रंजन,शैलेश जी , फाकिर साहब के जीवन और उनको सूचना संसार से उपेक्षित रहने को लेकर दु:खी हें जिन्दगी से बात करतीं गजल,जिन्दगी की बात करती ग़ज़ल, और जब सुदर्शन जी की शायरी ,बेगम अख्तर की आवाज़ के रथ पे सवार लगती कोई साम्राज्ञी की शोभा यात्रा हो, नए दौर में जगजीत सिंह के स्वरों के जारी हमारे कानों से सीधे दिल मी उतर वहीं बस गयी लगती फाकिर साहब की गज़लें. यूनुस खान ने बताया की सुदर्शन फाकिर इंटरव्यू, आत्म प्रकाशन जैसी बातों से दूर ही रहतें थे . एक गंभीर शायर जो आम बोल चाल के शब्दों को ग़ज़ल में आसानी से बदल देने वाले सुदर्शन फाकिर नहीं रहे वो बात कैसे लाते थे सादगी अपने कलाम में सुदर्शन फाकिर इस बात को समझने के लिए अब केवल हमको निर्भर रहना होगा उनकी रचनाओं पर किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी मुझ को एहसास दिला दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी मेरे रुकने से मेरी साँसे भी रुक जायेंगी फ़ासले और बड़ा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी ज़हर पीने की तो आदत थी ज़मानेवालो अब कोई और दवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी चलती राहों में यूँ ही आँख लगी है 'फ़ाकिर' भीड़ लोगों की हटा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी v सुदर्शन फ़ाकिर की रचनाएँ आदमी आदमी को क्या देगा आज के दौर में ऐ दोस्त आज तुम से बिछड़ रहा हूँ अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें अहल-ए-उल्फ़त के हवालों पे चराग़-ओ-आफ़ताब ग़ुम ढल गया आफ़ताब ऐ साक़ी दिल के दीवार-ओ-दर पे क्या देखा दुनिया से वफ़ा करके फ़ल्सफ़े इश्क़ में पेश आये ग़म बढ़े आते हैं हम तो यूँ अपनी ज़िन्दगी से मिले इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात जब भी तन्हाई से घबरा के जिस मोड़ पर किये थे किसी रंजिश को हवा दो कुछ तो दुनिया की इनायात मेरे दुख की कोई दवा न करो मेरी ज़ुबाँ से मेरी दास्ताँ पत्थर के ख़ुदा पत्थर के सनम फिर आज मुझे तुम को सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं शायद मैं ज़िन्दगी की सहर शैख़ जी थोड़ी सी पीकर आइये उल्फ़त का जब किसी ने उस मोड़ से शुरू करें ये दौलत भी ले लो ये शीशे ये सपने ज़ख़्म जो आप की इनायत है ज़िन्दगी तुझ को जिया है वो काग़ज़ की कश्ती दिल तोड़ दिया पत्थर के ख़ुदा गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" 9424358167 girishbillore@gmail.com

other link's http://www.hindimedia.in/content/blogsection/6/66/ ,http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_4198016/

Friday, February 22, 2008

पंकज गुलुश ने भी याद किया तिरलोक जी को ,मुझे भी याद आ रहे हें....!

एक व्यक्तित्व जो अंतस तक छू गया है । उनसे मेरा कोई खून का नाता तो नहीं किंतु नाता ज़रूर था । कमबख्त डिबेटिंग गज़ब चीज है बोलने को मिलते थे पाँच मिनट पढ़ना खूब पङता था । लगातार बक-बकाने के लिए कुछ भी मत पढिए ,1 घंटे बोलने के लिए चार किताबें , चार दिन तक पढिए, 5 मिनट बोलने के लिए सदा ही पढिए, ये किसी प्रोफेसर ने बताया था याद नहीं शायद वे राम दयाल कोष्टा जी थे ,सो मैं भी कभी जिज्ञासा बुक डिपो तो कभी पीपुल्स बुक सेंटर , जाया करता था। पीपुल्स बुक सेंटर में अक्सर तलाश ख़त्म हों जाती थी, वो दादा जो दूकान चलाते थे मेरी बात समझ झट ही किताब निकाल देते थे। मुझे नहीं पता था कि उन्होंनें जबलपुर को एक सूत्र में बाँध लिया है। नाम चीन लेखकों को कच्चा माल वही सौंपते है इस बात का पता मुझे तब चला जब पोस्टिंग वापस जबलपुर हुयी। दादा का अड्डा प्रोफेसर हनुमान वर्मा जी का बंगला था। वहीं से दादा का दिन शुरू होता सायकल,एक दो झोले किताबों से भरे , कैरियर में दबी कुछ पत्रिकाएँ , जेब में डायरी, अतरे दूसरे दिन आने लगे मलय जी के बेटे हिसाब बनवाने,आते या जाते समय मुझ से मिलना न भूलने वाले व्यक्तित्व ..... को मैंने एक बार बड़ी सूक्ष्मता से देखा तो पता चला दादा के दिल में भी उतने ही घाव हें जितने किसी युद्धरत सैनिक के शरीर,पे हुआ करतें हैं। कर्मयोगी कृष्ण सा उनका व्यक्तित्व, मुझे मोहित करने में सदा हे सफल होता..... ठाकुर दादा,इरफान,मलय जी,अरुण पांडे,जगदीश जटिया,रमेश सैनी,के अलावा,ढेर सारे साहित्यकार के घर जाकर किताबें पढ़वाना तिरलोक जी का पेशा था। पैसे की फिक्र कभी नहीं की जिसने दिया उसे पढ़वाया , जिसके पास पैसा नहीं था या जिसने नही दिया उसे भी पढवाया । कामरेड की मास्को यात्रा , संस्कार धानी के साहित्यिक आरोह अवरोहों , संस्थाओं की जुड़्न-टूटन को खूब करीब से देख कर भी दादा ने इस के उसे नहीं कही। जो दादा के पसीने को पी गए उसे भी कामरेड ने कभी नहीं लताडा कभी मुझे ज़रूर फर्जी उन साहित्यकारों से कोफ्त हुई जिनने दादा का पैसा दबाया । कई बार कहा " दादा अमुक जी से बात करूं...? रहने दो ...? यानी गज़ब का धीरज । सूरज राय "सूरज" ने अपने ग़ज़ल संग्रह के विमोचन के लिए अपनी मान के अलावा मंच पे अगर किसी से आशीष पाया तो वो थे :"तिरलोक सिंह जी "। इधर मेरी सहचरी ने भी कर्मयोगी के पाँव पखार ही लिए। हुआ यूँ कि सुबह सवेरे दादा मुझसे मिलने आए किताब लेकर आंखों में दिखना कम हों गया था,फ़िर भी आए पैदल । सड़क को शौचालय बनाकर गंदगी फैलाने वाले का मल उनके सेंडिल में.... मेन गेट से सीढियों तक गंदगी के निशान छपाते ऊपर आ गए दादा. अपने आप को अपराधी ठहरा रहे थे जैसे कोई बच्चा गलती करके सामने खडा हो. इधर मेरा मन रो रहा था कि इतना अपनापन क्यों हो गया कि शरीर को कष्ट देकर आना पड़ा दादा को .संयुक्त परिवार के कुछ सदस्यों को आपत्ति हुयी की गंदगी से सना बूढा आदमी गंदगी परोस गया गेट से सीडी तक . सुलभा के मन में करूणा ने जोर मारा . उनके पैर धुलाने लगी . मानव धर्म के आधार में करुणा का महत्त्व सुलभा से बेहतर कौन समझ पाया होगा तब. . तिरलोक जी का आशीर्वाद लेकर सुलभा ने जाने कितना कुछ हासिल किया मुझे नहीं मालूम . मेरे और अन्य साहित्यकारों के बीच के सेतु तिरलोक जी फिर एकाध बार ही आए अब तो बस आतीं हैं उनकी यादें दस्तक देने मन के दरवाजे तक ऐसा सभी साथी महसूस करते हैं. उनकी परम्परा को आगे जारी रखने के संकल्प के साथ जबलपुर के साहित्यकारों के दरवाज़े दस्तक देतें हैं मनोहर बिल्लोरे जी Ek koyala by Manohar Billore,

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